शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

‘आशावादी’ का राजस्थानी कहानी संग्रह : “आंख्यां मांय सुपनो” 02

आंख्यां मांय सुपनो (कहाणी संग्रह) मधु आचार्य ‘आशावादी’ / प्रकाशन वर्ष : 2015 / पृष्ठ : 88 / मूल्य : 150 /- प्रकाशक : ऋचा (इंडिया) पब्लिशर्स, बिस्सां रो चौक, बीकानेर
मधु आचार्य ‘आशावादी’
न्म : 27 मार्च, 1960 (विश्व रंगमंच दिवस)
शिक्षा : एम. ए. (राजनीति विज्ञान), एल.एल.बी.
1990 से राजस्थानी और हिंदी की विविध विधाओं में लेखन। ‘स्वतंत्रता आंदोलन में बीकानेर का योगदान’ विषय पर शोध। नाटक के क्षेत्र में विशेष कार्य। दो सौ से अधिक नाटकों में अभिनय और 75 नाटकों का निर्देशन।
प्रकाशन : राजस्थानी : ‘अंतस उजास’ (नाटक), ‘गवाड़’, ‘अवधूत’, ‘आडा-तिरछा लोग’ (उपन्यास) ‘ऊग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’, ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (कहाणी-संग्रै), ‘अमर उडीक’ (कविता-संग्रै), ‘सबद साख’ (राजस्थानी विविधा) का शिक्षा विभाग, राजस्थान हेतु संपादन।
हिन्दी साहित्य में दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। 
पुरस्कार : उपन्यास ‘गवाड़’ पर साहित्य अकादेमी नई दिल्ली एवं राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर कानी से ‘मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा-पुरस्कार’ के अतिरिक्त अनेक मान-सम्मन और पुस्कार। 
वर्तमान मे साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के सदस्य एवं दैनिक भास्कर (बीकानेर) के कार्यकारी संपादक। संपर्क : कलकत्तिया भवन, आचार्यां का चौक, बीकानेर (राजस्थान)
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पुस्तक के ब्लर्ब का अनुवाद 
नाटकीय संवाद कहानी कौशल का सामर्थ्य
० भंवर लाल भ्रमर, बीकानेर
       मधु आचार्य ‘आशावादी’ राजस्थानी और हिंदी साहित्य में सुपरिचित नाम है। अत्यंत हर्ष का विषय है कि इन वर्षों में अलग-अलग विधाओं में आपका निरतंत सृजन-कर्म प्रकाशित हो रहा है। इस नवीन कहानी संग्रह ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (आंखों में स्वप्न) से आपका कहानीकार रूप मजबूत होता नजर आता है। लेखक आशावादी का कहानी-लोक, अपने आस-पास की देखी-सुनी, जानी-पहचानी बातों और चरित्रों का रचाव कहा जा सकता है। कहानीकार के संग रहने वाले कुछ करीबी चरित्रों की रंग-भीनी छवियों-बातों को नाटकीय ढंग से प्रयुक्त करते हुए रचना में समेटते हैं कि हर कहानी हृदयस्पर्शी बन जाती है। कहानी कौशल का यह सामर्थ्य है कि नाटकीय संवादों के भाषाई जादू में किसी फिल्म की भांति दृश्यमान होती है।
       ‘आंख्यां मांय सुपनो’ संग्रह में कुल 9 कहानियां संकलित है। अपने यहां यह अंक शुभ माना जाता है। यह शुभ संकेत ही कहा जाएगा कि आज के दौड़-भाग के इस समय में लेखक आस्था, संस्कार और मूल्यों की पैरोकारी करने का प्रयास करता है। इन कहानियों में समय के सताए चरित्रों के शानदार उदाहरण मिलते हैं। कहानीकार ने अपने नाम के अनुरूप इन कहानियों में आशावादी स्वर और सोच संजोया है।
       ‘सीर री जूण’ के मोहन भा हो या ‘लाल गोटी’ के गफूर चाचा हो, चाहे ‘गोमती री गंगा’ कहानी की स्वयं गोमती हो... बहुत सारे चरित्रों में जीवन से जूझ और समस्याओं से सृजित आशा को देखा जा सकता है। ‘धरम री धजा’ का शब्बीर जहां हिंदू-मुस्लिम आदि सभी धर्मों से बड़ा धर्म मनुष्य का मनुष्य होना प्रस्तुत करता है तो वहीं ‘सरपंची रो साच’ उसी मनुष्य के जागरण की कहानी कही जा सकती है। नवीन सृजित होती इस दुनिया के आंगन में ‘घर री भींत’ के चोरुलाल जैसे चरित्र भी तो ‘सेवा रा मेवा’ के जीवण जैसे ही है, जो पाप-पुन्य मे मध्य स्वय़ं की माया नगरी रचते नजर आते हैं। यह भ्रम तोड़ने वाला मनुष्य इसी लोक से आएगा और ‘हेत री सूळ’ की नायिका मंजू जैसे अंततः चकाचौंध से तंग आकर वास्तविक उजियारे में नई स्थापनाएं करेंगे। इन कहानियों में कहानीकार का किसी प्रकार की शिक्षा देने का भाव नहीं है, वह तो बस इन चरित्रों के माध्यम से जीवन के राग-रंग और जूझ का चित्रण उपस्थित करता है जिस से पढ़ने वालों के हृदय में प्रकाश फैलता जाता है।
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बेजोड़ और जटिल चरित्रों की कहानियां
० नीरज दइया, बीकानेर
      हिंदी-राजस्थानी में सभी विधाओं और समान रूप से लिखने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी मधु आचार्य ‘आशावादी’ का दूसरा कहानी संग्रह है- ‘आंख्यां मांय सुपनो’। अपने पहले कहानी संग्रह ‘उग्यो चांद, ढ्ळ्यो जद सूरज’ और पहले उपन्यास ‘गवाड़’ से ही वे राजस्थानी में व्यापक चर्चा में रहे हैं। ‘आंख्यां मांय सुपनो’ में कहानीकार के आस-पास की दुनिया है। हर रचना का मुख्य आधार लोक ही होता है, बिना किसी लोक के कोई रचना संभव नहीं। कहा जाता है कि किसी रचना का आधार भीतरी अथवा बाहरी दुनिया का समन्वय होता है। वर्तमान समय में इन दोनों में संवाद का अभाव है। मुश्किल समय में इतनी व्यस्थता कि सहज संवाद के लिए समय ही कहां है? संवाद के मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं, या बंद कर दिए जाने के कगार पर हैं। इन कहानियों में कहानीकार ने हमारे संवाद का कहीं कोई सूत्रपात किया है।
      मूलतः नाटकनार आचार्य के रचना-संसार में संवाद की प्रमुखता और विधाओं का समन्वय प्रमुखता से मिलता है। अतिश्योक्ति नहीं होगी यदि कहा जाए कि ये कहानियां हमें हमारी आस-पास बिखरी लगती है, अथवा ये हमारी खुद की कहानियां हैं जिन्हें नाम बदल कर यहां संग्रहित किया गया है। ‘आंख्यां मांय सुपनो’ संग्रह की कहाणियों में कई यादगार पात्र मिलते हैं। मधु आचार्य ‘आशावादी’ के कथा-साहित्य का मूल आधार ही कुछ यादगार पात्र और चरित्र है। संभवतः उनके लेखन का उद्देश्य ही बेजोड़ और जटिल चरित्रों को प्रस्तुत कर अपनी बात कहना है।
     संग्रह की पहली कहाणी ‘सीर री जूण’ के मोहन भा ने पूरा जीवन बिना किसी रोजगार की चिंता में निकाल दिया, अंत में उनके भीतर एक बालक के अबोध शब्द जैसे किसी कंकर की भांति भीतर फैले एकांत में ऐसी हलचल या कहें तबाही मचाता है कि वे संसार छोड़ जाते हैं। दूसरी तरफ कहानी ‘लाल गोटी’ के गफूर चाचा अपने दुख को अपने आस-पास पसरी दुनिया में बच्चों के संग खेलते हुए जैसे विस्मृत किए रहने का हिंट देते हैं। तो कहानी ‘आंख्यां मांय सुपनो’ की पार्वती काकी आपने बेटे के इंतजार में जीते-जी ही जैसे पत्थर होकर खुद एक कहानी बन गई है। 
    राजस्थानी कहानियों में मधु आचार्य ‘आशावादी’ का अवदान कि वे जीवन-संघर्षों एवं त्रासदियों को हमारे सामने भाषा में घटित होते हुए प्रस्तुत करते हैं। इन कहानियों में सांप्रदायिक सद्भाव, एकता-अखंडता और भाईचारो भी उल्लेखनीय है। कहानी ‘धरम री धजा’ में मिंदर-मस्जिद के समन्वय का एक प्रमुख संदेश है। आश्चर्य होता है कि इस युग में शब्बीर और जगदीश जैसे मनुष्य भी हैं। जिस क्रम से विगत घटनाओं और चरित्रों को कहानीकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ आहिस्ता-आहिस्ता प्रगट करते हैं वह कहानी पढ़ते हुए जैसे प्रभावी भाषा से भीतर जीवंत हो कर गतिशील हो उठता है। कहाणी ‘सरपंची रो साच’ जैसी रचना से दुनिया में छल-छंद करने वालों के प्रति निंदा और घृणा का भाव हृदय में जाग्रत होता है। नई दुनिया और इंटरनेट की कहाणी ‘हेत री सूळ’ में है तो ‘सेवा रा मेवा’ में आधुनिक होते समाज के विरोधाभास और द्वंद्व उजागर हुए हैं। ‘गोमती री गांगा’ घर-परिवार और एक विक्षिप्त लड़की के मनोविज्ञान से जुड़ी बहुत ही नए विषय को लेकर मार्मिक और अविस्मरणीय कहानी है।
    मधु आचार्य ‘आशावादी’ को पढ़ते हुए मुझे उपन्यासकार-कहाणीकार यादवेंद्र शर्मा ‘चन्द्र’ का स्मरण इसलिए भी होता है कि उन्होंने बहुत से बेजोड़ पात्र कथा-साहित्य को दिए और कहाणीकार सांवर दइया का स्मरण इसलिए होता कि उन्होंने कई संवाद-कहाणियां लिखी। क्या यहां यह कहना उपयुक्त होगा कि इन दोनों रचनाकारों की सृजन-परंपरा का विकास हम मधु आचार्य ‘आशावादी’ के लेखन में देखते हैं। अंत में यह उल्लेख भी आवश्यक है कि हिंदी में भी लिखने वाले हमारे कुछ राजस्थानी लेखक अपनी हिंदी रचनाओं का अनुवाद मातृभाषा में प्रस्तुत कर, ऋण अदा करने का संतोष पाते हैं। इस से अलग उल्लेखनीय है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने विपुल मात्रा में हिंदी लेखन किया है फिर भी राजस्थानी में किसी अपनी ही रचना को अनुवाद कर मौलिक राजस्थानी लेखन के बतौर प्रस्तुत नहीं किया है।
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‘विषयगत’ दो कदम आगे की कहानियां 
० हरीश बी. शर्मा, बीकानेर
    ‘आंख्यां मांय सुपनो’ संग्रह की दो कहानियां हैं- 'हेत री सूळ' और 'गोमती री गंगा', ये पाठक को सोच के नए आयाम देती हैं। नेट-चैट से पनपते प्यार बनाम टाइमपास पर लिखी कहानी 'हेत री सूळ' समकालीन संदर्भों की उम्दा कहानी है, जिसमें बताया गया है कि दोष आविष्कारों या सुविधाओं का नहीं है, उन्हें बरतने में की जाने वाल बेवकूफियों का है। इसी तरह 'गोमती री गंगा' एक पागल किरदार की सहनशक्ति खत्म होने की कहानी है, पूरी कहानी में यह अपनी उपस्थित सिर्फ जिक्र भर से दर्ज करवाता है और अंत में भी एक जिक्र होता है। फिर भी यह चरित्र समझा जाता है कि हम जिन्हें पागल समझते हैं, उनकी संवेदनाओं का स्तर किसी समझदार से कमतर नहीं होता, बल्कि जब उनके जच जाती है तो फिर कोई आगा-पीछा भी नहीं सोचते। यथार्थ के धरातल पर रची कहानी 'हेत री सूळ' और संवेदनाओं का अन्वेषण करती कहानी 'गंगा री गोमती' ये खास कहानियां है।
    वरिष्ठ रंगकर्मी, पत्रकार, साहित्यकार मधु आचार्य 'आशावादी' की कहानी-कला की विशेषता है कि वे पाठकों को अपने पाठ में धीरे-धीरे एकाकार सहजता के साथ करते हुए विषय के अंत तक ले जाते हैं। पाठकों की आत्मीयता कथ्य से जुड़ कर कुछ ही देर में वे अपने आप को एक किरदार की तरह महसूस करने लगते हैं और इस अनुभव से एक यात्रा उसके जेहन में रहती है।
    मधु आचार्य 'आशावादी' का कहानी में कहन और बयान आधुनिक होते हुए भी कहानी-कला के परंपरागत मूल्यों को यहां देखा जा सकता है। वे अपने पाठक को कहानी के अंत में किसी अंधेरी हवेली में हाथ छुड़ाकर भागने जैसा व्यवहार करते दिखाई नहीं देते। यह उनकी सबसे बड़ी विशेषता है, और यही वजह है कि वे पाठक का तादात्म्य बनाते हुए स्मृतियों को स्थाई करते हैं। दूसरी बड़ी विशेषता भाषा का संवाद पक्ष है। संवाद यहां किसी शैली की भांति प्रयुक्त होती है। संभवतः उनका रंगकर्मी और नाटककार होना कहानी-कला में एक विशेष घटक के रूप में जुड़ता है। सरल-सुबोध और आम बोलचाल की भाषा में वे कहानी रचते हुए जैसे कहानी कहते हैं, बात को घुमा-फिराकर या प्रतीकों में उलझाकर कहना उनकी फितरत नहीं है। कहानियों की दार्शनिकता रुचिकर लगती है।
    संग्रह में नौ कहानियां हैं। शीर्षक-कहानी 'आंख्या मांय सुपनो' एक युवक के फौजी बनने और उसकी मां के इंतजार का आख्यान। यह संयोग ही है कि जिस वक्त यह कहानी पढ़ी जा रही है, ठीक उसी वक्त आतंकवादियों से भारतीय सेना के जवान लड़ रहे हैं, एक जवान रमेश की शहादत भी सात आतंकवादियों को मारने के बाद होती है।
    देश में दंगों की चपेट में आने वाले मासूमों की संवेदनाओं को उकेरती कहानी 'लाल-गोटी' है तो दूसरी ओर साम्प्रदायिकता समस्या के सामने चट्टान की तरह खड़ी कहानी 'धरम री धजा' है जिसमें कौमी-एकता की एक अनूठी मिसाल प्रस्तुत हुई है। 'घर री भींत' कहानी अपनी सारी जिंदगी सभी को जोड़कर रखने और बच्चों को बेहतरीन परवरिश देन की कोशिश करने वाले व्यक्ति की है, जिसे अंतत: बंटवारे की स्थितियों का सामना करना पड़ता है। संग्रह की पहली कहानी 'सीर री जूण' भी एक ऐसी ही कहानी है, जिसका किरदार मन के दुख-दर्दों पर मस्ती का मुखौटा लगाए फिरता है और ऐसी स्थितियां आ जाती है कि लोग मुखौटे को ही सच समझने लगते हैं। इस संग्रह में 'सेवा अर मेवा' और 'सरपंची रो साच' नए संदर्भों से जुड़ी कहानियां है।
    मधु आचार्य 'आशावादी' की विशेषता है कि वे अपनी बात को कहने के लिए नए विषयों का चयन करते हैं और बहुत सारे विषय तो ऐसे होते हैं, जिन पर साहित्यकार-समाज का अभी तक ध्यान ही नहीं गया है। यह दौर में जहां शिल्प पर काम किया जा रहा है, महत्त्वपूर्ण है कि मधु आचार्य 'आशावादी' नए विषयों को सामने रख रहे हैं। शिल्प से साहित्यकार का वजूद बनता है और नए विषयों के आने से साहित्य का समाज से सरोकार सघन होता है। कहना होगा कि ये कहानियां ‘विषयगत’ दो कदम आगे की कहानियां हैं।
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