शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

बुलाकी शर्मा का राजस्थानी कहानी संग्रह “मरदजात अर दूजी कहाणियां’

पुस्तक : मरदजात अर दूजी कहाणियां / विधा : कहानी/ कहानीकार : बुलाकी शर्मा/ संस्करण : 2013, प्रथम / पृष्ठ : 88, मूल्य : 150/- प्रकाशक : ऋचा (इंडिया) पब्लिशर्स, बिस्सों का चौक, बीकानेर- 334005
बुलाकी शर्मा
जन्म : 01 मई, 1957 बीकानेर में।
राजस्थानी में ‘कवि, कविता अर घराअळी’ एवं ‘इज्जत में इजाफो’ चर्चित व्यंग्य संग्रह। ‘हिलोरो’ एवं ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ दो कहानी संग्रहों के अलावा दो बाल उपन्यास ‘साच नै नीं आंच’ तथा ‘हुंकारिया हुकमोजी’। राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर से ‘शिवचंद्र भरतिया गद्य पुरस्कार’ से सम्मानित। राजस्थान साहित्य अकादमी , उदयपुर से हिंदी व्यंग्य लेखन के लिए पुरस्कृत। हिंदी में दो कहानी संग्रह, तीन व्यंग्य संग्रह  और आठ बाल साहित्य की पुस्तकें प्रकाशित। अनेक संस्थाओं से पुरस्कृत-सम्मानित। 
संपर्क : सीताराम द्वार के सामने, जस्सूसर गेट के बाहर, बीकानेर-334004 
सात तालों में बंद चेहरों का आईना
० मोहन थानवी, बीकनेर
        चार दशक से साहित्य के वृहद केनवास पर अहसास और अनुभवों को शब्दाकार देने वाले कथाकार, व्यंग्यकार, नाटककार बुलाकी शर्मा की कृति “मरदजात अर दूजी कहाणियां” के पात्र अंतर-आत्मा के भी अंतःस्थल को सामने ले आते हैं। कहानियों में समाज और परिवेश के वे पहलू भी रेखांकित होते जाते हैं जो राजस्थानी कहानियों में अब तक प्रायः ओझल रहे हैं। ऐसा शिल्प कवि-मन उकेर सकता है। बुलाकी जी काव्य-विधा को गूढ़ और स्वयं के लिए असाध्य मानते हैं। लेकिन उन्होंने कविताएं लिखी भी हैं, जिन्हें वे कविता नहीं मानते व कहते हैं इसलिए पाठकों तक नहीं पहुंचाई। बुलाकी जी का कहानी संग्रह “मरदजात अर दूजी कहानियां” कथा-शिल्प की बेजोड़ नजीर है।
        यूं राजस्थानी साहित्य जगत में कहानी का क्षेत्र विस्तृत रहा है। नई कहानी के शिल्प में कतिपय ऐसी रचनाएं भी रही हैं जिनमें लोक कथाओं के सूत्र भी मिल जाते हैं। लेकिन राजस्थानी कहानी के परंपरागत स्वरूप से इतर यदि आधुनिक राजस्थानी कहानियों के गठन और कथा-परिवेश की तारतम्यता को विगत तथा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जानना समझना हो तो बुलाकी जी की कहानियां इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी।
        नवाचार बुलाकी जी की रगों में है और कहानियों में भी विविध पात्रों से इसकी पुष्टि करते हैं। संग्रह की कहानी ‘अमूझती सूझ’ के पात्रों को ही लें, मंगल, मास्टर जी और मंगल की मां के मन को मानों पाठक सहजता से पढ़ लेता है। जब कथाकार मंगल के द्वारा पटाक्षेप करवाता है, आपकी जिद कायम रही तो मुझे घर छोड़कर जाने में कोई ऐतराज नहीं। मास्टर जी भोंचक रह जाते हैं। किंतु, यहां पाठक रोमांच और रस प्राप्त करता है।
बुलाकी जी ने कथा सृजन में ऐसी सिद्धहस्तता हासिल की है कि वे नव कोंपलों के सूर्य रश्मियों से मिलन पर चमकने की प्राकृतिक प्रक्रिया की भांति शनै शनै शब्द-शब्द गुंजाते हुए पात्र-चरित्र के उस मुखड़े को सामने ला खड़ा करते हैं, जो भवन की सात कोठियों से भी आगे अंधकार में लुप्त प्रायः होता है। इसी कथ्य-जादूगरी के कारण पाठक को बुलाकी जी की रचना की प्रथम पंक्ति से ही संवेदनाओं का सागर हिलोरे मारता दिखता है और वह तिलिस्मी पात्र के साथ मानवीयता का गहरा नाता महसूसता है। शीर्षक कहानी ‘मरदजात’ में बुलाकी जी ने एक नारी पात्र के अंतरमन को इस खूबी से उकेरा है कि पाठक समूची कहानी में सुगनी के चरित्र को जानने के लिए उत्सुक रहता है। खूबी यह कि कहानी के विराम तक पहुंचते-पहुंचते सुगनी का मन खोल कर पाठकों के सामने पसर रोमांचित कर देती है। अपने मान-सम्मान के लिए दुर्गा सदृश्य सुगनी ऐसा पात्र है जिस पर बुलाकी जी चाहें तो वृहद उपन्यास लिख सकते हैं।
        सामाजिक सरोकारों का निर्वहन करते हुए संग्रह की अन्य कहानियों जैसे- ‘मरम’, ‘घाव’, ‘दूजो सरूप’, ‘बर्थ डे प्रजेंट’ आदि के पात्र और परिवेश हमें अपने आसपास घटने वाले प्रकरणों की याद दिलाते हैं। यही कहानीकार बुलाकी शर्मा जी की शैली पाठक को उनकी रचनाएं पढ़ने की ललक पैदा करती हैं।
        कहानी ‘मुगदी कद’ के माध्यम से बुलाकी जी बालपन से दर्द के मर्म को सामने रखते हुए कुत्ते के मुंह में दबोचे हुए कबूतर की फड़फड़ाहट का ऐसा दृश्य उकेरते हैं और सवाल उठाते हैं, कि मुक्ति कब।/बुलाकी जी सफल नाटककार हैं। संग्रह की कहानियों में नाटकीयता की तुलना में यथार्थ अधिक प्रखरता से सामने आया है। सर्वाधिक उल्लेखनीय बात यह है कि कहानियों में प्रस्तुत चरित्र मुखौटा उतारे हुए और अपने मूल चेहरों को लिए इन कहानियों में देखाई देते हैं। यही बुलाकी जी की लेखनी की श्रेष्ठता और सफलता है।
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संबंधों के बनने और बिगड़ने का रचाव
० डॉ. नीरज दइया
    वरिष्ठ कहानीकार बुलाकी शर्मा का कहानी-लोक असल में मध्यवर्गीय जीवन परिस्थितियों और संबंधों का उनका चिर परिचित संसार है। कहानीकार शर्मा ने ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ संग्रह की कहानियों में प्रमाणिकता के साथ स्वयं एवं अपने आस-पास के जीवन को रचने का उपक्रम किया है। निसंदेह कहानियों में उनका व्यंग्यकार मुखर है। इसी के रहते परंपरा, पुरानी मान्यताएं, बदलता समय और समाज, परिवर्तित होते संबंधों में जूझते घर-परिवार सभी कुछ समाहित है। इन राजस्थानी कहानियों को कहानीकार के विविध अनुभवों के क्रमबद्ध किसी समुच्चय के रूप में देखा-समझा जा सकता था, किंतु पुस्तक में कहानियों के रचनाकाल का उल्लेख नहीं है। ऐसी स्थिति में संग्रह की कहानियों में घर-परिवार और ऑफिस से जुड़ी मनःस्थितियों और लेखकीय दृष्टिकोण पर चर्चा संभव है।
    कहानियों पर चर्चा करें उस से पहले मैं बुलाकी शर्मा की कहानियों का नियमित पाठक होने के नाते स्पष्ट करना चाहता हूं कि आपके प्रथम कहानी संग्रह ‘हिलोरो’ की कहानी ‘परछांई’ को परिवर्तित नाम ‘अमूझती सूझ’ से आंशिक भाषिक परिवर्तनों के साथ यहां शामिल किया गया है। शर्मा के दोनों राजस्थानी कहानी-संग्रहों के बीच बीस वर्षों का लंबा अंतराल है। अस्तु यहां प्रस्तुत उनकी प्रिय कहानी बीस वर्षों की कहानी-कला की कमाई भी कही जा सकती है। कहानी में दो पीढ़ियों में बीच परसा संबंधों का ऐसा परिदृश्य है कि जिसमें नई पीढ़ी के मार्फत मास्टर जी अपनी विगत स्मृतियों में पहुंच कर नव-सांसों से जैसे रोमांचित हो महक उठते हैं।
    मां-बाप और बेटे-बहू के संबंधों को लेकर बुलाकी शर्मा ने कई चर्चित कहानियां लिखी हैं। जैसे- लसणियो, चोखै संबंधां खातर, सौगंध, छूटती धरती, मरजदात, डायरी रो पाना, दूजो सरूप और अगाऊ चिंता। रक्त संबंधों में यदि हम मन के संबंधों और रिस्तों को शामिल कर लें तो बुलाकी शर्मा की कहानी-यात्रा के मूल स्वर तक हम पहुंच सकते हैं। व्यक्ति अपने घर-परिवार के साथ-साथ काम-काज के स्थल के साथियों से भी घुल-मिल कर रहता है। कार्य स्थल पर होने वाली विविध घटनाएं उसके कार्य-व्यवहार पर असर करती है। भ्रष्टाचार के संदर्भों से जुड़ी इन कहानियों में असल तथ्य तो संबंधों के बनने और बिगड़ने का है। कहानीकार ऐसी जीवन स्थितियों के चित्रण से पाठकों को उस बिंदु तक ले आता है जहां से वे मनुष्यता के आदर्श का एक स्वप्न बुनते हैं। यहां अंधविश्वासों और संस्कारों की कसमसाहट है तो संवेदनाओं की सघनता के बीच हृदय से जुड़ी अनेक व्यथाएं भी उजागर हुई हैं। मनुष्य के मशीन में तब्दील हो जाने की यंत्रणा से जूझ और जीवन मूल्यों का संघर्ष इन कहानियों में राजस्थानी परिवेश के साथ उद्घाटित हुआ है।
    कहानी ‘मरदजात’, ‘घाव’ और ‘बर्थ डे प्रजेंट’ की नायिकाएं अपने समय के समक्ष हार नहीं मानती हैं। इन कहानियों में व्यक्त इनका विश्वास यह भी प्रदर्शित करता है कि राजस्थानी समाज में गहरे तक फैली संस्कृतिक आस्थाओं और जीवन-मूल्यों पर इस बदलाव के दौर में भी किसी प्रकार का कोई हमला सफल नहीं हो सकता है। कहानियों का भाषिक और शैल्पिक पक्ष कहानियों में प्रस्तुत सत्यों को अनुकूल है। जीवन के अलग-अलग रंगों को प्रस्तुत करती शर्मा की इन कहानियों में संबंधों के उतार-चढ़ाव है तो धैर्य के साथ रचना-कौशल भी हमारा ध्यान खींचता है। कहानी ‘अैब’ के द्वारा जतनलाल जी अपने पुत्र के विवाहोपरांत नई नवेली बहू पर संदेह इसलिए करते हैं कि उन्हें लगता है मांग से भी अधिक दहेज देकर उनके समधी ने जैसे कुछ छिपाने का प्रयास किया है। कहानी में कहानीकार और जतनलाल जी का परस्पर संवाद नवीन मानसिकता को प्रस्तुत करता है। ‘खण सूं बंध्योड़ो’ में नए लेखकों पर व्यंग्य है तो ‘मुगती कद’ में मनोवैज्ञानिक रंग है। ‘चिड़ियाघर’ संस्मरण परक कहानी है, तो ‘डायरी रा पाना’ में कहानी में डायरी विधा का सफल प्रयोग हुआ है।
    सार में कहें तो इन कहानियों में बदलते संबंधों के साथ खोखले होते हमारे संबंधों का सच उजागर हुआ है। सर्वाधिक प्रभावित करने वाला तथ्य यह है कि कोई भी रास्ता इन कहानियों में पाठकों को आरोपित प्रतीत नहीं होता। यह महज संयोग है कि प्रथम संग्रह ‘हिलोरो’ की पहली कहानी ‘लसणियो’ में मां की तरफ पुत्र का प्रस्थान है और इस नवीन संग्रह की अंतिम कहानी ‘अगाऊ चिंता’ में मां का स्वर्गवास और उसके पिता के शब्द- ‘समय मिले तो आ जाना...’ जैसे अब तक वर्णित तथ्यों का साक्ष्य है।
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लोक जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज
0 नदीम अहमद ‘नदीम’, बीकानेर
    अपने पात्रों के माध्यम से पाठकों से रिश्ता कायम करने वाले लोक जीवन के चितेरे कहानीकार बुलाकी शर्मा का राजस्थानी कहानियों का संग्रह ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ की तमाम कहानियां जनचेतना को जागृत करतीं हैं और मनोवैज्ञानिक धरातल पर सामाजिक ताने-बाने से बुनी ये ऐसी कहानियां हैं जो हमें अभिनव अहसासों से पोषित करती है।
    संग्रह की शीर्षक कहानी ‘मरदजात’ की कथानायिका रोजमर्रा के जनजीवन का साक्षात् दर्शन करवाती है। कहानीकार ने इस कथानक में मानवीय संबंधों की जटिलता को बहुत सरलता और सहजता से उकेरा है। यह कहानी  महज कहानी नहीं वरन् दुनिया की तमाम अबलाओं को एक सार्थक संदेश देती है कि आत्मविश्वास के बिना किसी समस्या का समाधान नहीं। ‘सुगनी’ नाम की सुकोमल नारी पात्र का रणचंडी बनकर मर्दाना गालियां देना और त्रिभुवन द्वारा ‘बुआ’ सम्बोधन और दायित्व निर्वहन की पहल से ‘सुगनी’ का पुनः परिवर्तित चरित्र अविस्मरणीय है। यह राजस्थानी की प्रतिनिधि कहानी कही जा सकती है।
    ‘घाव’ कहानी में भी नारी चरित्र प्रतीक रूप में समाज के ‘घाव’ प्रदर्शित करती है। इस कहानी में मार्मिकता की पराकाष्ठता देखी जा सकती है। दूध-मुंहें बच्चे को मां का दूध कैसे नसीब हो, यही चिन्ता मां को झूठ बोलने पर मजबूर करती है। दवा की शीशी को वापिस दुकानदार को देना और उसके बदले पैसे से अपने पेटे की आग बुझाने की जुगत में लगी इस नारी चरित्र ने अपनी अस्मिता को बरकरार रखते हुए पूरे समाज के लिए एक अनुत्तरित सवाल प्रस्तुत किया है। कहानीकार बुलाकी शर्मा कथा-स्थितियों में सामन्य से घटनाक्रम को साधारण से असाधारण बनाने का हुनर जानते हैं।
    सच तो यह है कि कहानीकार बुलाकी शर्मा अपनी कहानियों के माध्यम से समाज में अंतिम पंक्ति में उपस्थित उस आम आदमी की परेशानियों और दुख-दर्दों से समाज को अवगत कराते हैं। कोशिश यह कि पाठक स्वयं निर्णय करे। पाठक के विवेक को जाग्रत करती इन कहानियों में उपदेश से बचना कहानीकार की सफलता है।          
हिन्दी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में समान रूप से सृजन करने वाले वरिष्ठ कहानीकार बुलाकी शर्मा यद्यपि सम्पादक, स्तम्भ लेखक और व्यंग्यकार के रूप भी पर्याप्त पहचान रखते हैं मगर आपका कहानी संग्रह ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ लोक जीवन का ऐसा प्रामाणिक दस्तावेज है कि जिसमें पाठक आम-अवाम के छोटे-छोटे सुख, विडम्बनाएं, दुखों के पहाड़ पर चढ़ते लोगों की जिजीविषा देखकर अचंभित और अभिभूत भी होते हैं, और कहानियों के पात्र जब संघर्ष में विजयी होते है तो हर्ष होता है।
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कहानियों में पाठकीय जिज्ञासा की बहुलता
० डा. मंगत बादल, रायसिंह नगर
     बुलाकी शर्मा अपनी कहानियों के कथानक वहां से उठाते हैं जहां सामान्य कहानीकार उसे बेकार समझ कर अक्सर छोड़ देते हैं। ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ संग्रह को पढ़ते हुए पाठक की सतत जिज्ञासा बनी रहती है कि वह आगे क्या कहेगा, क्योंकि वह यह बात जानता है कि जो बात पाठक सोचता है लेखक उस से जुदा बात कहेगा। यही पाठकीय सोच बुलाकी शर्मा को अन्य कहानीकारो से अलग और विशिष्ट बनाती है।
    मानव चरित्रों के मन की परते उधेड़ता वह कोई ऐसा सत्य उजागर करता है जो पाठकीय चेतन को झकझोरता हुआ सोचने को विवश करता है। उनकी ‘मरदजात’ कहानी ऐसे नारी चरित्र को उजागर करती है जो अपनी कोमलता को ढके खुद की रक्षार्थ ऐसा आवरण धारण करती है जो वास्तविकता से परे है। कहानीकार ने यहां पात्रों के चरित्र-चित्रण का मनोवैज्ञानिक ट्रीटमेंट किया है। इसलिए सुगनी एक विशेष मनोवैज्ञानिक चरित्र है। ऐसे अनेक चरित्र हमारे इर्द-गिर्द हैं, जिन्हें हमने कभी गौर से देखा ही नहीं। ‘अेब’ कहानी के जमनालाल इतने कांईया है कि वे आपनी लिछमी सरीखी बहू में कोई ऐब ढूंढ़ कर उसके पिता को और निचोड़ना चाहते हैं। समाज में ऐसे लालची लोगों की कमी नहीं है जो बगुले भगत बन कर लोगों नै लूटते हैं।
    बुलाकी शर्मा की कहानी ‘अगाऊ चिन्ता’  आज की उस गैरजिम्मेदाराना पीढ़ी को लेकर लिखी गई है जो अपने वृद्ध माता-पिता और घर-परिवार को भूल कर सिर्फ अपनी औलाद को ही आगे बढ़ाने में अपना फर्ज मानती है। लेखक ने बहुत सफाई के साथ यह बताया है कि कथानायक ने जैसा व्यवहार अपने पिता के साथ किया, वैसा ही उसके साथ भी होने वाला है। दहेज को लेकर बहू के संग बुरा व्यवहार करने वाले मास्टरजी (अमूझती सूझ) जब स्वयं के बेटे को देखते हैं कि वह पत्नी को दहेज के लिए छोड़ने को तैयार नहीं, तो वे तिलमिला कर रह जाते हैं। परंतु जब उनकी पत्नी उनके उस प्रसंग को स्मरण में लाती है जब वे भी जवानी में इसी प्रकार किया करते थे, यह जानकर उन्हें सद्बुद्धि आती है।
    ‘मुगती कद’ एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। बचपन में पतंग लूटने से धागे से घायल एक कबूतर का कुत्ते द्वारा उठा ले जाने का मार्मिक घटना-प्रसंग है। यह कथा-नायक की जिन्दगी पर ऐसा असर करता है कि वह भविष्य में पतंग उडाना ही छोड़ देता है। यह एक मार्मिक कहानी है। राजस्थान में आखातीज और अन्य दिनों में लोग जब पतंगें उडाते हैं तो उन से कितने ही पक्षी घायल होकर मरते हैं, इस का वर्णन लेखन ने बखूबी कहानी में किया है। ‘अमोलख भाईसा’ और ‘घाव’ एक ही भावभूमि पर बुनी गई दो कहानियां हैं। लोग जानते-बूझते दया के पात्र बनकर जब सीधे-सादे लोगों की संवेदना का दोहन करते हैं, तो उनका खामियाना वास्तव में दुखी लोगों को भुगतना पड़ता है।
    कहानियों की भाषा बहुत सधी हुई और कथानक के सर्वथा अनुकूल है। कहानीकार ने कई कहानियों में शैल्पिक प्रयोग भी किए हैं। बुलाकी शर्मा मूलतः व्यंग्यकार है, संभवतः इसी कारण इन काहनियों में उनका वाक्य-विन्यास छोटा और भाषा चुस्त है।
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मध्यम-वर्ग के दुख-दर्द की बेहतरीन कहानियां 
० संजय पुरोहित, बीकानेर 
     कहानीकार, व्यंग्यकार, संपादक, समीक्षक आदि अनेक रूपों में बुलाकी शर्मा लंबे समय से निरंतर राजस्थानी और हिंदी भाषाओं में सृजनरत हैं। उनकी रचनाओं के पाठक यह भली-भांति जानते हैं कि वे बेहतरीन सृजक हैं। यद्यपि व्यंग्यकार रूप में अधिक विख्यात कहानीकार बुलाकी शर्मा की कहानी-कला पर कम ध्यान दिया गया है। ऐसे में उनका दूसरा कहानी संग्रह ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ युगबोध एवं नव-प्रयोग से राजस्थानी कहानी परिदृश्य में अलग से पहचाना जा सकता है।
    कहानी ‘मरदजात’ एक अविस्मरणीय स्त्री-चरित्र को हमारे सामने प्रस्तुत करती है। किसी पुरुष द्वारा स्त्री-विमर्श की इस बेहतरीन कहानी में स्त्री चरित्र का समयानुकूल परिवर्तित रूप और प्रकृति प्रदत्त कोमलता का सुंदर समायोजन है। सुगनी का भाषा-व्यवहार और कहानीकार द्वारा कथ्य का भाषिक-रूपांतरण समग्र घटनाक्रम को एक दृश्यावली में ढाल देता है। कहानी ‘बर्थ डे प्रेजेंट’ में एक गरीब जवान विधवा का जीवन, समस्याएं और उसकी मजबूरियां हैं, तो समाज में मजबूरी का फायदा उठाने वाले भेड़ियों का भी वर्णन है। महत्त्वपूर्ण यह है कि कहानीकार स्त्री-अस्मिता के प्रश्न के साथ महिला-सशक्तिकरण का संदेश भी अपने पाठ में अंतर्निहित कर देता है। स्त्री के समर्पण को कहानी ‘घाव’ की ‘मंगती’ (भिखारिन) एक नए रूप में मार्मिकता के साथ उजागर करती है।
    ‘अबूझती सूझ’ कहानी में कल्पनातीत एक ऐसे षडयंत्र को कहानीकार ने उजागर किया है कि पूरी कहानी अंत में जैसे किसी समय विशेष की स्मृति में परिवर्तित हो जाती है। निश्चय ही इन कहानियों की मनोवैज्ञानिकता इन्हें किसी यादगार संस्मरण में बदल देती है। यहां संबंधों का बनता-बिगड़ता ग्राफ समकालीन यर्थाथ को व्यंजित करता है। कहानी ‘मुगती कद’ को संग्रह की मनोविज्ञानता पर आधारित प्रतिनिधि कहानी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। शिल्प और संवेदना से पोषित इस कहानी में स्थानीयता और लोक-परंपरा का निर्वाहन है तो साथ में अबोले पक्षियों की अमानवीय हत्याओं पर सांकेतिक टिप्पणी भी है। ठेठ राजस्थानी भाषिक व्यंजना से सजी संग्रह की कहानियों में यत्र-तत्र और सर्वत्र पठनीयता और भाषा में प्रवाह है। उदाहरण स्वरूप इसी कहानी में पतंगों और रंगों के लिए प्रयुक्त ये शब्द जैसे हमारे मन को छूते हैं- “टीकल, पटियल, डंडल, फरियल, जीभल, लाल, काळा, हरिया, धोळा, किरमची, पीळा आद भांत भांतीला।”    ‘अमोलख भाईसा’, ‘खण सूं बंध्योड़ो’, ‘मरम’ जैसी कहानियों को कहानीकार के व्यंग्यकार होने का लाभ मिला है। ‘आगोतर सारू’ कहानी सामान्य है। ‘डायरी रा पाना’ कहानी असल में कहानी के रूप में डायरी है। बुलाकी शर्मा के यहां कहानी में अन्य विधाओं को प्रयोग के रूप में समाहित किया गया है। यहां यह भी कहना समीचीन होगा कि इन कहानियों में लोककथाओं के सेठ साहूकारों और अमीर-गरीब रूढ़ चरित्रों के स्थान पर राजस्थान के मध्यम वर्ग के उस आदमी की सूरत देखी जा सकती है, जिसके दुख-दर्द, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद और चिंताएं समकालीन समय और समाज का यर्थाथ है। तिस पर विशेषता यह भी कि इन कहानियों का अंत हमें आरंभ में मालूम नहीं होता और जब हम अंत तक पहुंचते हैं तो तयशुदा अंत से अलग कुछ नया ही अंत हमारे सामने आता है।
    संग्रह की अंतिम कहानी ‘अगाऊ चिंता’ में माता-पिता और संतान के अंतर्द्वंद्व को आर्थिक आधार और आधुनिकता के स्तर पर अभिव्यंजित किया गया है। गांव में अपने माता-पिता को संभालने के लिए दो चक्कर नहीं लगाने पड़े, इसलिए बेटा गांव में टेलीफोन लगवा देता है। पुत्र की अनदेखी और संवेदनहीनता के कारण अंत में उसे फोन पर संदेश मिलता है कि तुम्हारी मां नहीं रहीं। सुबह संस्कार है। समय मिले तो आ जाना।” यह कहानी संबंधों और संस्कारों में आती गिरावट और मनुष्यता का पाठ है। संग्रह की 14 कहानियों में हर कहानी की अपनी-अपनी भावभूमि है, जिसे कहानीकार ने यथाअनुकूल भाषा-शिल्प के साथ प्रस्तुत किया है। इन कहानियों में समाजिक सरोकारों पर बल दिया गया है।
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संवेदना का पर्याय ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’
० श्रीलाल जोशी, बीकानेर
 

      कहानी गुंथी जाती है कि उच्चरित? मथी जाती है कि बरती जाती है? अहम सवाल है सृजनात्मक दृष्टि का।  मथते हुए चिंतन का सार निकाले तो स्पष्ट दृष्टिगोचर होगा कि मथते हैं वही गुंथता है और बरतते हैं वही उच्चारित होता है। यह सब सृजक की समझ, सामर्थ्य एवं सिद्धहस्तता के वशीभूत होता है। मूल में आज की सच्चाई बाह्य दृष्टि से सिर्फ पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, परमार्थिक... आदि दृष्टिगत होती है, किंतु अंदर गहरी डुबकी लगाने पर कुछ और ही दृष्टिगोचर होने लगता है। यह भावभूमि मुझे इसलिए बतानी आवश्यक लगी क्योंकि मैं चाहता हूं कि कहानीकार बुलाकी शर्मा के राजस्थानी कहानी-संग्रह ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ को आप बिना किसी प्रकार के दुराग्रह के खुले हृदय से पढ़े-परखें, जैसे मैंने खुली दृष्टि से परखा-पढ़ा है।
      बात करते हैं कहानी ‘मरदजात’ की। ठहरकर ढूंढ़े- गहरे उतरें। तार-तार को तोलें-मथें। इस प्रक्रिया से गुजरते हुए कहानी मूल घटक स्वतः समझा देता है कि लज्जा का परित्याग करने के पश्चात औरत कुछ भी कर सकती है, फिर उसे ‘मरदजात’ बनने में किंचित समय भी नहीं लगता। प्रतिरोध की प्रक्रिया का सृजन होता है इस कहानी में। वैसे ही, भूख कितने ही कौतुक-करतब रचती रहे, स्वांग धरती रहे किंतु औरत लाज-शर्म और धर्म को कभी विस्मृत नहीं करती- ‘घाव’ कहानी दृढ़ता से इसका साक्ष्य है। क्या हम कह सकते हैं कि ये कहानियां मात्र सामाजिक हैं? या समाज के फलक का विस्तार है? हक तो ‘दाता’ यानी ईश्वर का ‘पहुंचा’ मरोड़ने पर ही मिलता है, गिड़गिड़ाने से नहीं। औरत मन से कोमल है किंतु कमजोर नहीं है। उसे रणचंडी बनते देर नहीं लगती। कहानी ‘बर्थ डे प्रजेंट’ इसका प्रमाण है। इसमें पुरुष की औरत के प्रति लोलुप मानसिकता उद्घाटित होती है। इस कहानी का प्राण-तत्व है कि जुबान की भाषा सभी जानते हैं किंतु औरत पुरुष की आंख की, अंग-प्रत्यंग की और हाव-भाव की भाषा भी अच्छी तरह जानती है। कहानीकार बुलाकी शर्मा ने इस कहानी में एक विवाहित के विधवा बनने के पश्चात उसके प्रति पुरुष-वर्ग की बदलती संवेदना, भाषा, भावों की रंगत को बारीकी से चित्रित किया है। कहानी नायिका प्रेमा का चरित्र प्रतिकार की मिसाल बन गया है। कहानी आकार में छोटी किंतु सुगठित प्रभावी और संवेदना से ओतप्रोत है।
      भविष्य पर दृष्टि टिकाए, पीढ़ियों के बीच व्याप्त दूरी को उकेरा है ‘डायरी रा पाना’ और ‘अगाऊ चिंता’ कहानियों में। इसमें पीढ़ियों के संस्कारों का लेखा-जोखा है। डायरी के बहाने मथे जाथे जाते रिश्तों से निसृत होती साख-सीख उच्चरित किए बिना ही कहानीकार समझा देता है। ‘अगाऊ चिंता’ सिक्के का दूसरा पहलू है। यहां कहानी में अलोप भाव दृष्टिगत होता है, जैसे सिकुड़ते रिश्ते। पीढ़ियों के बीच दूरियां हमारे व्यवहार के कारण बढ़ती है। ‘डायरी रा पाना’ और ‘अगाऊ चिंता’ से यह समझ आता है- जो एक घर नहीं, एक समाज नहीं, एक शहर नहीं, देश नहीं, सभी उलझे हैं गृहस्थी के चक्रव्यूह में। ‘अमूझती सूझ’ कहानी में मास्टरजी इस बात को लेकर बेचैन है कि बेटे के श्वसुर से दहेज कैसे लेवें, वहीं ‘ऐब’ कहानी में दहेजलोभी जनतराम की बहू में ‘ऐब’ ढूंढ़ने में उलझे हैं ताकि समधी से और दहेज लिया जा सके। कहानीकार ने ऐसे लोभी व्यक्ति की भावना और नीयत को पर्त दर पर्त खोलकर रख दिया है- ‘ऐब’ कहानी में। इन दोनों कहानियों में अनूठा बतरस यानी किस्सागोई है। ‘मरम’ कहानी की शिक्षा ग्रहण करने योग्य है, वहीं ‘मुगती कद’, ‘चिड़ियाघर’ कहानियां बाल-मन के भावों की शानदार बानगी है। ‘अमोलख भाईसा’ एक रिश्वतखोर की ऐसी ही नाटकीय अभिव्यक्ति है कि इसका रंगमंच पर प्रभावी मंचन किया जा सकता है। ‘आगोतर सारू’, ‘दूजो सरूप’ और ‘खण सूं बंध्योड़ा’ कहानियां व्यंग्य-विनोद से ओतप्रोत होने से पाठकों को बांधे रखती है।
      इस संग्रह की कहानियों के अंतर्लोक मेम विचरने के पश्चात कह सकते हैं कि बुलाकी शर्मा स्वयं को औरत की संवेदना के पर्याय सिद्ध करते हैं। बुलाकी हेत-अपनत्व से परिपूर्ण मानवता की समझ रखने वाले कहानीकार हैं। मानवीय चेतना और प्रतिकार का हुनर रखते हैं प्रगतिशील दृष्टि के कारण। बतौर कहानीकार अंतरमन को मांझते, चमकाते और गुंथते चलते हैं।
      बुलाकी शर्मा की ये कहानियां राजस्थानी कहानी को नई ऊंचाइयां देने वाली हैं। उन्हें बधाई।
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सामाजिक भाव-भूमि की सशक्त कहानियां
० मदन गोपाल लढ़ा, महाजन, बीकानेर
 

      ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ के कहानीकार बुलाकी शर्मा को हम सामाजिक भाव-भूमि के सशक्त रचनाकार कह सकते हैं। शर्मा की कहानियां अपने आस-पास के परिवेश और समाज को कुशलता के साथ शब्दबद्ध करती है। इन कहानियों के माध्यम से ऐसे चरित्र प्रकाश में आते हैं जो दिन-रात हमारे इर्द-गिर्द ही मौजूद होते हैं। इस अर्थ प्रधान युग में पारिवारिक और सामाजिक संबंधों का परिवर्तित रूप, गरीबी की मजबूरियां, सामाजिक कुरीतियां, धार्मिक पाखंड, अंधविश्वास, गंदी राजनीति आदि को प्रमुखता के साथ उजागर करने का श्रेय बुलाकी जी को दिया जा सकता हहै। परम्परा के दृष्टिकोण से देखें तो वे नानूराम संस्कर्ता, नृसिंह राजपुरोहित, अन्नाराम सुदामा, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, करणीदान बारहठ, सांवर दइया की पंक्ति के कहानीकार कहे जाते हैं।
      संग्रह की कहानी ‘चिड़ियाघर’ बाल मनोविज्ञान की सशक्त कहानी है। बालमन जानवरों से बेहद खुश रहता है। बबलू और डोली भी चुन्नु-मुन्नु के संग हिल-मिल जाते हैं। परंतु जब वे मनीप्लांट को हानि पहुंचाते हैं तो मम्मी उन्हें घर में रखने से मना कर देती है। मनीप्लांट से सुख-सम्पति आती है या नहीं, चुन्नु-मुन्नु को चिड़ियाघर में छोड़ आने से उनके घर में उदासी अवश्य फैल जाती है। एक अच्छी कहानी में जो कुछ व्यक्त होता है उस से अधिक वह अव्यक्त छिपा कर रखती है। उसे खोजना देखना पाठक-आलोचक का काम है। ‘बर्थडे प्रजेण्ट’ में कहानीकार का यह कौशल दिखाई देता है। वह घटनाओं के द्वारा मनःस्थितियों को प्रस्तुत करता है, पर स्वयं कुछ नहीं कहता। नारी जाति की सर्वाधिक सबलता उसका आत्मबल होता है। इस कहानी की नायिका प्रेमा इसकी साक्षी है। वह बड़े बाबू की गलत नीयत से दिया गया ‘बर्थडे प्रेजेंट’ पूरी सख्ती के साथ लौटा देती है।
‘मरदजात’ नारी मनः स्थितियों के अलग अलग रंगों को प्रस्तुत करती शानदार कहानी है। ‘डायरी रा पाना’ सिर्फ पुस्तक ही नहीं, बुलाकी शर्मा की प्रतिनिधि कहानी के रूप में याद रखी जाएगी। डायरी विधा में रचित यह कहानी मनुष्य-व्यवहार के दोगलेपन और परम्पराओं के मोह-भंग के साथ पारिवारिक जीवन की छूटती धरती का यथार्थ-परक अंकन है। इसी भांति ‘अगाऊ चिंता’ का विषय तो बीनया नहीं पर निर्वहन उम्दा है। आधुनिक समय और समाज में पीढ़ियों के अंतराल और बदलते लोक व्यवहार को इन कहानियों में देखा जा सकता है। एक मां अपने नवजात की भूख मिटाने के लिए क्या-क्या नहीं करती इसका परिदृश्य ‘घाव’ में मिलता है। ‘दूध आवै के नीं, देखायां सूं ठाह पड़ै।’ भीड़ से आया स्वर का जबाब समाजिक मुखौटों को बेनकाब करता है- ‘अै ई देखावणा हुवता जणा रोंवती कोनी फिरती’, रीस सूं उणरी आंख्यां लाल चुट हुयगी, ‘जणा थे चला‘र म्हारै पगां में पीसा न्हाखता। चाम रा भूखा गिंडक...’ (पृ. 21)
      एक पुस्तक में सभी कहानियां सशक्त और शानदार हो यह जरूरी नहीं होता। लेखकीय मोह से कुछ रचनाएं संग्रह में ऐसी भी शामिल हो जाती हैं जिनका होना जरूरी नहीं होता या जिन्हें भरती की रचनाएं कहा जा सकता है। इसी प्रकार प्रत्येक विधा की अपनी मर्यादा है। कहानी के नाम पर रेखाचित्र - संस्मरण भी संग्रह में शामिल देखे जा सकते हैं। बानगी के तौर पर ‘खण सूं बंध्योड़ो’ और ‘आगोतर सारू’ को पढ़ते हुए हमें संस्मरण विधा का अहसास होता है। ‘अमोलख भाईसा’ की थीम तो नई है मगर बात ठीक से जमी नहीं। इसकी नाटकीयता पाठ को बाधित करती है।
      बुलाकी शर्मा री कई कहानियों में बाजारवाद के बहाने मनुष्यता के बदलते रंगों को पहचानने का बेहतरीन प्रयास भी हुआ है। यह एक विचारणीय तथ्य है कि बहुत बार अच्छी-भली रचनाएं भी ‘अननॉटिस्ड’ रह जाती हैं। वैसे यह तो ऐसा प्रश्न है जिसका सरोकार समग्र रचनात्मकता और राजस्थानी साहित्य से है। निसंदेह इस पुस्तक में राजस्थानी कहानी यात्रा को आगे बढ़ाने वाली कई कहानियां पाठकों तक पहुंची है। इन कहानियों के कथ्य और शिल्प पर खुल कर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए।
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बुलाकी जी की बेजोड़ और परिपक्व कहानियां
० राजेन्द्र जोशी, बीकानेर

राजस्थानी भाषा में सर्वथा अलग अंदाज की कहानियां व्यंग्यकार-कहानीकार बुलाकी शर्मा के संग्रह ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ में देखी जा सकती है। संग्रह की कहानियां इतनी पठनीय है कि आरंभ के बाद इति तर आना जरूरी हो जाता है। समाज से सीधे जुड़ाव रखने वाली इन कालजयी कहानियों की विशेषता यह भी है कि ये कहानियां प्रत्येक वर्ग को प्रभावित करने वाली हैं। वर्तमान सरोकार और व्यंग्य के साथ संग्रह की कहानियां नारी-अस्मिता और सामजिक बदलावों के साथ अनेक अविस्मरणीय चरित्रों को प्रस्तुत करती हैं।
    ‘मरजजात’ की नायिका सुगनी वैसे तो हर समय गालियां निकालती और धमकाती नजर आती हैं किंतु अंत में उसकी गालियों पर ताला लग जाना चरित्र की मार्मिकता और आंतरिक व्यंजना को उजागार करता है। आकार में बहुधा ये छोटी-छोटी कहानियां सचमुच घाव करती है, हमें हंसाती और गुदगुदाती है वहीं हमारे भीतर परिवर्तन के बीज भी छोड़ती है।
    बुलाकी शर्मा ने वर्तमान भष्ट्रचार पर तीखा प्रहार किया है साथ ही इस के नए नए तरीके भी कहानी में कथा-पात्र अमोलख भाईसा द्वारा दिखाए गए हैं। ‘अमोलक भाई’ को सामाजिक सरोकारों की आधुनिक कहनी कह  सकते हैं। जीवन में भावनात्मक रिश्ता जोड़कर भ्रष्टाचार की शैली, चिंतन-धारा में आए बदलाव को घटनाक्रम के माध्यम से कहानीकार ने नगद धन, मिठाई और भाई का भावनात्मक रिश्ता ऐसा बुना है कि हमे लगता है राजस्थानी कहानी के आंगन में ऐसे कलेवर की नई कहानियां भाषा को समृद्ध करती है।
    कहानीकार की नजर में आस-पास फैले घटनाक्रम ही कहानी का कच्चा माल है जिनसे संवेदनाशील मन प्रभावित होता है और शर्मा कहानी में उसे रचते हैं। चलते राहगीर और गरीब की गरीबी का एक अनूठा चित्रण बुलाकी शर्मा की कहानी में आता है तो महिला के संदर्भ से जैसे बदलते विश्व के दर्शन हो जाते हैं जहां देह ही सब कुछ है इसके ठीक विपरीत कहानीकार अब भी उन जीवन मूल्यों और सावधानी की दिशा में संकेत करता है जो रेखांकित किए जाने चाहिए।
    बुलाकी शर्मा ने डायरी के माध्यम से कहानी लिखने की कलात्मक शैली विकसित की है जिसे पढ़ कर पाठक प्रभावित होते हैं। इसमें निजता और स्थानीयता का भाव उल्लेखनीय है। मंझे से कबूतर का कट कर गिरना ऐसा प्रसंग है कि एक बार इस से गुजर जाने पर हम इस मर्म को जान लेते हैं और अंतस से आवाज आती है कि ऐसा नहीं होना चाहिए, इसके लिए हम क्या कर सकते हैं। कोई कहानी यदि ऐसा कुछ करने में सक्षम है तो कहानी कला की इस सार्थकता का श्रेय कहानीकार को दिया जाना चाहिए। संग्रह की अन्य उल्लेखनीय कहानियों में चिड़ियाघर, आगोतर, दूजो सरूप, खण सूं बंध्योड़ो आदि कही जा सकती है जिन में अनुभवों का कलात्मक भाषिक रूपांतरण हमें प्रभावित करता है।
    बुलाकी शर्मा की कहानियों में विभिन्न प्रकार के विषयों में राजस्थानी का सांस्कृतिक परिवेश है तो भासा और कहन की स्थानीयता पाठकों से एक अनकहा आत्मीय रिश्ता साधने में कामयाब है। यहां कहानीकार के विराट व्यक्तित्व का अहसास होता है। कहना ना होगा कि राजस्थानी में गत चार दशक में यह संग्रह बेजोड़, कालजयी और परिपक्व होने का पक्का और पुखता अहसास करता है।
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मानव मन के परिष्कार में कारगर कहानियां
० सत्यनारायण परलीका
        कहानी वह जो कही जाए। लेखक पाठक को कहता-सा लगे। यही कला लेखक को पाठक के करीब ले जाती है। पाठक और लेखक का यह एकाकार किसी कहानीकार की बड़ी सफलता होती है। आज की कहानी किसी बंधे-बंधाए फ्रेम में नहीं, उससे बहुत भिन्न नजर आती है। वह कभी रेखाचित्र तो कभी संस्मरण, कभी व्यंग्य तो कभी डायरी, तो कभी रिपोर्ताज का सा अहसास भी लगातार देती रहती है।
        बुलाकी शर्मा का कहानी संग्रह ‘मरदजात और अन्य कहानियां’ पढ़ते हुए यह अहसास लगातार बना रहा। वे कहन-कला में तो दक्ष हैं ही, परिवार-मनोविज्ञान के भी मर्मज्ञ हैं। संग्रह की प्रत्येक कहानी पारिवारिक संबंधों के ताने-बाने में बुनी हुई है। इस संग्रह की कहानियों के माध्यम से वे निरंतर बेहतर परिवारों के सृजन के लिए प्रयासरत नजर आते हैं। क्योंकि इसी में देश और दुनिया की खुशहाली निहित है।
        मरदजात, घाव, अमूझती जूझ और बर्थ डे प्रेजेंट कहानियां संग्रह के शीर्षक को सार्थक करती हैं। ‘मरदजात’ की सुगनी हालातों की मारी दबंग औरत का रूप धार लेती है और कमजोरी यह कि जब-तब मुंह-छूटी गालियां बकने लगती है, मगर उसके भीतर का मोम सरीखा दिल नारी स्वभाव में ढल त्रिभुवन की उचित सलाह पर मौन स्वीकृति देता है तो वह पाठक की श्रद्धा की पात्र बन जाती है। ‘घाव’ की भिखारिन बेबसी की मारी ठगी करने पर उतारू हो जाती है और आवश्यकता पड़ने पर मर्दों को उनकी औकात बता देती है। ‘बर्थ डे प्रेजेंट’ की प्रेमा पति के निधन पर उनके स्थान पर लगी नौकरीपेशा महिला है और चरित्र के मामले में पूरी दबंग। ‘अमूझती जूझ’ की लक्ष्मी का पति जब अपने बेटे की शादी में आए दहेज को पर्याप्त नहीं समझता तो लक्ष्मी उसे अपनी वक्तृत्व कला से जवानी के दिन याद दिलवाकर मना लेती है और इस प्रकार परिवार को बिखरने से बचा लेती है।
‘मरम’ और ‘अेब’ कहानियां भी दहेज-लोभी लोगों की मानसिकता को व्यक्त करती हैं। ‘अमोलख भाईसा’ ठगी की नित नई होने वाली व्यूह रचनाओं में से एक का खुलासा करती है। जिस तरह लोग आज भावनाओं और संवेदनाओं का व्यापार करने लगे हैं। निश्चय ही यह चिंता का विषय है।
        बचपन की कुछ घटनाएं इंसान के मन पर गहरा असर करती हैं और वे उन्हें उम्रभर कचोटती रहती हैं। ‘मुगती कद’ एक ऐसी ही मार्मिक और मनोवैज्ञानिक कहानी है, जिसमें बचपन की घटनाओं से जुड़े संस्मरण लेखक का पीछा नहीं छोड़ते। जीवों के प्रति दया का भाव जगाने में भी यह कहानी सक्षम साबित हुई है। ‘चिडि़याघर भी एक ऐसी ही कहानी है जो जीव-जीव में भेद को विगलित करने में सक्षम हुई है। जहां बालमन की निर्मलता हो, वहां यह भेद रह ही नहीं सकता। मनीप्लांट के पौधे कुतर डालने पर जब घर के पालतू खरगोशों को चिडि़याघर में छोड़ दिया जाता है तो बालक बबलू विरोधस्वरूप मनीप्लांट की डालियां तोड़ डालता है और जोर-जोर से चिल्लाने लगता है, ‘म्हनै ई चिडि़याघर में घाल दो। चुन्नु-मुन्नु अेक पौधो कुतर्यो हो, म्हैं सगळा गमला तोड़ दिया। घाल दो म्हनै चिडि़याघर में चुन्नु-मुन्नु रै साथै। म्हैं अठै कोनी रैवणो चावूं....।’
        ‘दूजो सरूप’ कहानी बताती है कि बाहर से कठोर दिखने वाले इंसान के भीतर भी कोमल-सा दिल होता है और वह भी उपयुक्त अवसर पर पसीज जाता है। ‘खण सूं बंध्योड़ो’ राजस्थानी के ऐसे नवोदित रचनाकारों की ओर इशारा करती है जो आलोचना सुनना ही पसंद नहीं करते। ‘अगोतर सारू’ एक व्यंग्य कथा है जो आधुनिक संतों, महंतों, मठाधीशों, कथावाचकों की पोल खोलती है। ‘डायरी रा पाना’ और ‘अगाऊ चिंता’ व्यतीत होते जा रहे पारिवारिक-रागात्मक संबंधों की मार्मिक दास्तानें हैं।
        ये कहानियां साबित करती हैं कि बुलाकी शर्मा समाज-मनोविज्ञान के पारखी, पारिवारिक अनुभवों से मंजे-तपे विरले सृजक हैं जो अपनी कहन-क्षमता के बल ऐसी कथा बुनते हैं जिससे पाठक बंधा तो रहता ही है, संवरता-निखरता भी जाता है। यही किसी रचनाकार का पहला और अंतिम ध्येय होना चाहिए। भाषा में ठेठ गंवईपन न होकर मध्यमवर्गीय कस्बाई परिष्कृत स्वरूप परिलक्षित होता है। यह कहूं कि लेखक की अपनी निजी ठसक, अपना निजी लहजा समस्त कहानियों में बरकरार है। निश्चय ही यह संग्रह मानव मन के परिष्कार में कारगर सिद्ध होगा।
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सहज-सरल संवेदन और ‘कहन’ की ताजगी
० आईदान सिंह भाटी, जोधपुर

      ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ के केंद्र में समकालीन राजस्थानी समाज है। इस संग्रह की कहानियां राजस्थानी आंचलिकता की सजग तस्वीरें हैं, सब ही इनमें मानवीय मनोवृत्तियों के ऐसे ऐसे चित्र हैं कि जिनमें से गुजर कर पाठक न केवल हतप्रभ रह जाता है, बल्कि यह विचारने को विवश हो जाता है कि विकास, तकनीक और शिक्षा के बल पर अपने को प्रगतिशील कहने वाला समाज कितना गलित और सूगलवाड़े से भरा है। लेखक बुलाकी शर्मा की सहजानुभूति इन कहानियों में स्पष्ट ही मानवीय संवेदन को सुरक्षित रखने की है।
     संग्रह की अधिकांश कहानियों में नारी चरित्रों के आख्यान हैं। ये हमारे समाज की उस सडांध को सामने लाते हैं, जो पौरूषिक दंभ का पर्याय है। ‘मरदजात’, ‘घाव’, ‘अमूझती सूझ’, ‘डायरी रा पाना’, ‘दूजो सरूप’, ‘मरम’, ‘बर्थ डे प्रजेंट’ और ‘ऐब’ इत्यादि कहानियों के मूल में नारी चित्राम है, जो विवशतः घुटन भरी जिंदगी जी रहे हैं। शीर्षक कहानी इन सब कहानियों में इसलिए प्रमुख है कि एक स्त्री को अपनी ‘इज्जत आबरू’ बचाने के लिए पौरूषिक खोल ओढ़ना पड़ता है और उसके चरित्र की उस मर्दानगी के आगे सभी नाक रगड़ रहे हैं, लेकिन जब त्रिभुवन उसके उस रूप की रूग्णता को सामने रखता है तो वह अपने मूल स्वरूप में लौट जाती है। लम्पट समाज की लोलुपता से बचाने को यह सुगनी द्वारा ओढ़ा गया एक नकली खोल था, जो सच्ची संवेदना पाकर वैसे ही लुप्त हो गया, जैसे उफनते दूध में शीतल जल के छींटे पड़ जाते हैं।
     भारतीय समाज और खासकर राजस्थानी कस्बाई समाज की एक जबरदस्त समस्या है- दहेज प्रथा। लेखक की आधी कहानियां इस समस्या को कई कोणों से उठाती है और पाठक को बेचैन करने के साथ ही सोचने को विवश करती है कि आखिर हम कहां जा रहे हैं। ‘दूजो सरूप’ की सुधा की विवशता और सासू का अपनी बेटी अलका की ‘दहेज हत्या’ पर बहू को प्रताड़ित करना हमारे घर-परिवारों की जाहिलता और बेशर्मी के नंगे रूप रचकर लेखक हमें सोचने को विवश किया है कि समाज केवल शिक्षित होकर नहीं बदलने वाला। हमारी रुग्ण मानसिकता के ये दहेज लोभी किस्से इन कहानियों मे पृष्ठ-दर-पृष्ठ अनेक कोणों से उभर कर सामने आते हैं। ये अलग-अलग कोण ही वह लेखकीय कौशल है, जो उसे प्रतिष्ठित कथाकारों की सूची में सम्मिलित करवाता है। जतनलाल जैसे चरित्र बुलाकी शर्मा की कलम से ही निकल सकते हैं। बेटे की शादी में कोई कसर नहीं रखने वाले समधी को दहेज के लिए प्रताड़ित करने के लिए अपनी पुत्र-वधू के चरित्र पर शंका का ‘नुखस-सोधना’ एक मानवीय चरित्र की हद-दर्जे की गिरावट का अंकन इस कहानी को बेहद ही रोमांचक और विशिष्ट बनाता है। इंसान ऐसा भी हो सकता है, यह सवाल बारबार पाठक को खाने लगता है और उसके शरीर पर जतनलाल के विचार-कीट रेंगने लगते हैं। झाड़ने की कोशिश करने पर भी वे उसकी खाल पर चिपक कर उसे सडांध से भर देते हैं। पाठक अपने मानवीय समाज और अपने आप को मनुष्य़ मानने पर शंकालु हो उठता है। पाशविकता और जाहिलता की ओर बढ़ते समाज के ऐसे ही चित्र ‘अमूझती सूझ’, ‘मरम’ आदि कहानियों में अभिव्यक्त होते हैं, जहां हम मानवीय रिश्तों की सीवनें उधड़ती हुई देखते हैं।
     बुलाकी शर्मा के कथा-विन्यास की विशेषता उसकी सरलता, सहजता और भाषा की व्यंग्यात्मक शैली है। विचार और संवेदन भाषा में घुलकर एकमेक हो जाते हैं। बिना कोई नारा बने या लेखकीय मत उदृत किए ये कहानियां सरल और ‘सहज’ कथा बुणगट की ये कहानियां हिंदी की प्रेमचंदीय परंपरा से जुड़ती है। सहज-सरल संवेदन और ‘कहन’ की ताजगी इस संग्रह की विशेषता है।
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