बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

सतीश छिम्पा का कहानी संग्रह : ‘‘वान्या अर दूजी कहाणियां’’

वान्या अर दूजी कहाणियां (राजस्थानी कहाणी संग्रह) सतीश छिम्पा / संस्करण : 201 6 / पृष्ठ :100 / मूल्य : 100 रुपये / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर- 9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर 
सतीश छिम्पा
जन्म : 14 नवम्बर, 1986  शिक्षा : एम.ए., बी.एड.
अपने पहले ही कहानी संग्रह ‘वान्य अर दूजी कहाणियाँ’ से चर्चित कहानीकार छिम्पा कहानी को मूलतः जन जागरण और चेतना का वाहक मानते हैं। उनकी पहचान राजस्थानी कहानी में नए प्रयोग और युवा मन की बेलाग अभिव्यक्ति के रूप में की गई है। मूलतः सतीश कवि है और राजस्थानी में उनके दो मौलिक कविता संग्रह- ‘डाण्डी स्यूं अणजाण’ और ‘एजेलिना जोली अर समेस्ता’ प्रकाशित हुए हैं साथ ही आपकी कविताएं युवा कवियों के प्रतिनिधि संकलन ‘मंडाण’ में भी संकलित है। संपादक के रूप में ‘किरसा’ नामक अनियतकालीन पत्रिका का प्रकाशन भी आपने किया। हिंदी में कविता और अनुवाद की पुस्तकें प्रकाशित। अनेक संस्थाओं से पुरस्कृत-सम्मानित।
संपर्क : वार्ड नंबर-11, त्रिमूर्ति मंदिर के पीछे, सूरतगढ़- 334804
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अभिनव प्रयोग की राजस्थानी कहानियां
० डॉ. नीरज  दइया, बीकानेर

          युवा कवि-कहाणीकार सतीश छिम्पा का ‘वान्या अर दूजी कहाणियां’ पहला कहानी संग्रह है। संग्रह में संकलित दस कहानियों में संवेदना के स्तर पर कहानीकार कहानी में भाषा और भाव के स्तर पर कविता करता है। यहां दोनों विधाएं बेहद नजदीक आती हुई, जैसे एकमेक हो जाती है। वैसे ‘वान्या अर दूजी कहाणियां’ संग्रह को मार्क्सवादी विचारधारा का एक लंबा गीत कहा जा सकता है। जिसकी मूल संवेदना वर्तमान समय में बदलती मानवीय भावनाएं, मानसिकता, सार्वभौमिक प्रेम, युवाओं के सपने-संघर्ष, बदलती दुनिया और रोजगार की समस्याओं के बीच संघर्ष करती नई पीढ़ी है। 
          संग्रह में ‘वान्या’ शीर्षक कहानी की कथा-नायिका वान्या है। ‘वान्या’ नाम से कहानीकार को अत्यधिक लगाव है जिस के रहते अन्य कई कहानियों की नायिकाओं के नाम भी वान्या रखे गए हैं। और विशेष बात यह भी कि यह संग्रह वान्या को समर्पित है। आखिर वान्य कौन है? कोई सच या सपना? यदि सच है तो कहानीकार ने समव्यस्क नायिका से जुड़ी आत्मकथात्मक कहानियां लिखी है। कहानी तो सपनों को सच में फिर-फिर रचने का आनंद है। ‘वान्या’ के प्रेम में लिखी इन कहानियों में सार्वभौमिक प्रेम है वह देश-विदेश की सीमाओं से परे कहीं आ-जा सकता है और कहीं भी किसी को बुला सकता है। कहानीकार ने अपने शहर सूरतगढ़ को इन कहानियों में अनेक स्थलों पर इस भांति गूंथा है कि पूरा वहां का पूरा मानचित्र हमारी आंखों के सामने आता है- कॉलेज, आकाशवाणी, सड़कें और दौराहे-तिहारों के साथ बहुत सी जगह तो साथ स्वयं सूरतगढ़ ही किसी देह रूप में पाठकों से मिलता है। राजस्थानी कहानी के संदर्भ में इसे अभिनव प्रयोग कहा जा सकता है।
          “बीं गा गुरू जी प्रवीण भाटिया बीं नै रोज फोन कर-कर नै कैंता ‘आपां नै हारणो कोनी, दूणी मेंनत कहणी है- कामयाबी जरूर मिल सी।’ पण बो हार ग्यो... हार ग्यो घर रै हालातां अर बारी-बारी री असफलता स्यूं। फेर सोचै- ‘अजे के बीगड्यो है- फेर खड्यो हो स्यूं अर कामयाब हो स्यूं।’ इस्सा विच्यार बीं रै मन में आवै अर जावै- पण सार किं कोनी नीसरै। पण मां री आंख्यां देख उण रो मन सरणाटो खींच ज्यै।”
(कहानी- म्हूं बेगो इ घरे आ स्यूं ; पृष्ठ-38)
          प्रवीण भाटिया सूरतगढ़ में स्वनाम धन्य शिक्षक हैं और सतीश प्रेरित रहा है। असल में इन कहानियों में सूरतगढ़ की जिस कसबाई मानसिकता का जिक्र शत प्रतिशत यर्थाथ है और यहां अभिव्यक्त एक सूरतगढ़ नहीं ऐसे अनेक सूरतगढ़ देश में है। संज्ञाओं को विलुप्त कर देखा जाए तो पाठक अनेक सवालों से घिर जाता है। ऐसा कैसे हो सकता है? क्या यह सब कुछ सच है, झूठे तो वे सपने भी नहीं हैं जो कहानियों के पात्र देखते हैं। ‘वान्या अर दूजी कहाणियां’ बदलते युग में बदलते प्रेम को अपने पूरे परिवेश में व्याख्यायित करती है- यह प्रेम विजातीय और सहजातीय दैहिक भी है। डॉ. हीरेन, आईसलैंड का रॉबर्ट, लेस्बीयन बबीता, वान्या और स्वयं नरेटर प्रेम के इन कई रूपों में मिलती है तो पुरानी मानसिकता के आधार पर इन्हें खारिज किया जा सकता है।
          गलोब्लाइजेशन की गिरफ्त में दुनिया नितांत छोटी हो गई है, तो पूरा देश-दुनिया गड़मड़ है। इन कहानियों के माध्यम से कहानीकार समय और समाज के बदलते अथवा कहें बदले हुए चेहरे की पहचान सर्वथा नई भाषा-शैली में करवाता है। यहां पात्रों द्वारा पूरी व्यवस्था और सत्ता एकमेक है, जहां हर कोई आपने सोच से अमीर-गरीब है, कोई किसी से प्रेम करता हुआ सब कुछ अपनी इच्छाओं से कर सकता है।
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वैश्विक दृष्टिकोण की कहानियां
० कपिल शर्मा, जानकीदासवाला (सूरतगढ़)

सतीश छिम्पा का पहला राजस्थानी कहानी संग्रह ‘वान्य अर दूजी कहाणियां’ पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि यह उनका पहला संग्रह है। संग्रह की कहानियां परिपक्कव है और राजस्थानी कहानी परंपरा को विकसित करने वाली कही जा सकती है। अपनी शैली और भाषा के लिहाज से संग्रह की कहानियां कहानी विकास यात्रा में नई जमीन तलाशती एक नया मोड़ कही जा सकती है। यहां कहानियों का उद्देश्य केवल मन को बहलाना नहीं है वरन वे हमारे अंतस को झकझोर कर बदलते समय और समाज के आकलन को प्रेरित करती हैं। इन कहानियों में कमजोर यथार्थ अथवा आदर्शवाद नहीं वरन रुग्ण होता यथार्थ और बदलती आर्थिक स्थितियां जीवन की परिस्थितियां केंद्र में है।
    राजस्थानी युवा कहानी ही नहीं पूरे विकास क्रम में घर, परिवार, गांव और खेत के इर्द-गिर्द के यथार्थ को व्यापकता से प्रस्तुत किया जाता रहा है, इसके ठीक उल्ट सतीश छिम्पा के यहां दृष्टिकोण व्यापक, विशद और वैश्विक होता देखा जा सकता है। संग्रह की कहानियों में भाषा की नई रवानी, शिल्प की जबरदस्त चकाचौंध और वैचारिक स्तर पर मार्क्स से जुड़ती सबलता है। कहानियों में युवा आक्रोश की अभिव्यक्ति पात्रों की भाषा और व्यवहार में देख सकते हैं। स्थानीय भाषा और लोक में रचे बसे जीवंत मुहावरे-कहावते इन कहानियों में अनायास ही प्रयुक्त हुए हैं, उनका सौंदर्य उनके अपने स्थलों पर स्वयं विकसित होने में समझा जा सकता है। भाषा का खुलापन और स्वच्छंदता पुरातन प्रेमियों में चर्चा और आलोचना का विषय हो सकती है।
    ‘म्हैं बदळग्यो’, ‘जीवण गै कैनवास पर एक कोलाज’, ‘फोटु में चे ग्वेरा मुळकै’ आदि कहानियां इस संग्रह का प्राण है तो “वान्या’ कहानी संग्रह ही नहीं समकालीन युवा कहानी यात्रा में एक अविस्मरणीय रचना है। सतीश के यहां स्थूल और सुरक्षित विषयों से इतर दुस्साहसिक लेखन के बल पर कहानी में नई स्थापनाएं देख सकते हैं। संभवतः कहानीकार का मानना है वर्तमान बदलते समय और समाज में अब सुरक्षित और तटस्थ होकर रहना संभव नहीं है। वह पूरी जिम्मेदारी और जबाबदेही के साथ आज की उपभोक्तावादी संस्क्रुति के बीच फैल रहे समलैंगिगता जैसे मुद्दे को भी कहानी का विषय बनाता है।   
    सतीश छिम्पा की कहानियां फेसबुक के मौजूदा दौर के ऐसे युवा साथियों की कहानियां है जो योग्य होकर भी बेरोजगार हैं। जो व्यापक साहित्यिक-सामाजिक बदलते जीवन का अध्ययन प्रस्तुत करता है वहीं झूठे आदर्शों के स्थान पर विकसित हो रहे नए समाज और स्त्री-पुरुष मानसिकताओं के साथ कुछ अनदेखी मगर सच्ची तस्वीरें सामने लाता है।
    यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सतीश छिम्पा राजस्थानी की अकादमिक भाषा-शैली को आयातित करने के स्थान पर उसे अपनी बोली के मोह में अपने आस-पास के स्थलों गलियों और चौबारों में खुली छोड़ता अधिक उपयुक्त समझता है। निसंदेह मौजूदा कहानी परिदृश्य में इस संग्रह की अनेक कहानियां नई स्थापनाएं रचती है।
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परंपरागत कहानी के ढांचे में बदलाव
० कमल प्रकाश, सूरतगढ़

मनुष्य, समाज और राजनीति का द्वंद्व झेलती हुई आज की कहानी इनका विश्लेषण भी करती है। ‘वान्य अर दूजी कहाणियां’ राजस्थानी के ऊर्जावान युवा कहानीकार सतीश छिम्पा का प्रथम कहानी संग्रह है जो परंपरागत कहानी ढांचे में बदलाव का सूचक भी है। संपूर्ण संसार में आज जो समस्याएं व्याप्त है जिस तनाव और संत्रास को पूरी मानव जाति झेल रही है उस से बचे रहना किसी भी रचनाकार के लिए सहज नहीं है। मनुष्य के व्यापक और सार्वभौमिक बदलते स्वरूप को जैसे यहां आवाज दी गई है। यहां संस्कृतियों का समन्व्य और विरोधाभाष के साथ द्वंद्व भी चित्रित हुआ है। अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर जिन विषयों की चर्चा होती है, जो छोटे गांव और कस्बों के जन जीवन को भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहे हैं उन्हीं कुछ विषयों की बानगी सतीश छिम्पा के नए कहानी संग्रह में अनेक नवीनताओं के साथ प्रस्तुत हुए हैं।  
    वान्य कहानी में प्रगट समलैंगिकता एक बीमारी की तरह हमारे समाज में बहुत तेजी से फैलती जा रही है। इसे बेशक ‘बोल्ड’ और ताज्य विषय संपादकों-आलोचकों द्वारा समझा जाए किंतु यह अछूता विषय जब सतीश की कहानियों में समाहित होता है तो उनके व्यापक अध्ययन और चिंतन-मनन का प्रतिफल कहा जाना चाहिए। यह कहानी में अतिआधुनिकता का प्रस्तान बिंदु है। 
‘साईकिल वाळी छोरी’ कहानी का शिल्प और कहानी लेखन का चुटिला तरीका सतीश का मौलिक और निजी कहा जा सकता है। यह शुरुआत सतीश की कलम से हुई है कि वे उन सब दृश्यों और स्थितियों को परिभाषित करने का हुनर जटिल परंपराओं और रूढ़ स्थापनों के बीच लोकभाषा में संभव कर दिखाते हैं। ‘वान्या’, ‘रीवोलूशन कद आसी’, ‘फोटु में चे ग्वेरा मुळकै’ जैसी कहानियां कहानीकार को एवं उनके विचारों को स्थापित करने वाली कही जा सकती है।
    सतीश की कहानियों की भाषा छोटे-छोटे वाक्यों में सधी हुई चलती है। हल्का मंगर चुटिला व्यंग्य बोध भी इन कहानियों में देखा जा सकता है। बिलकुल नई पृष्ठभूमि को कहानी में किसी चित्र के कैनवास की भांति यहां बार बार प्रयुक्त होता देखा जा सकता है। कहानीकार ने संग्रह की कहानियों में अपने खास और उम्दा रंगों को होले होले बिखेरते हुए अपने प्रभाव को सांद्र और गहरा किया है। यह प्रभाव लंबे समय तक हम में बना रहता है, इसे कहानीकार की मौलिक और निजी उपलब्धि माना जाना चाहिए। इन कहानियों में युवा मानसिकता इस कारण भी प्रामाणिकता से प्रस्तुत हुई है कि ये एक युवा कलम का रचाव है। शहरों और कस्बों में प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में जुड़े युवक-युवतियों के जीवन संघर्षों को यहां स्वर मिला है। यह इन कहानियों की सफलता है कि लेखक और पाठक के बीच की दूरी को पाटती ये कहानियां अपनी सी लगने लगती है। इन कहानियों के द्वारा हम इन विषयों पर संवाद का आगाज कर सकते हैं। अंत में कहना है कि इन कहानियों के माध्यम से राजस्थानी कहानी अपने नए तेवर और उज्ज्वल भविष्य की दिशा में गतिशील दिखाई देती है। भविष्य में भी उनसे ऐसी ही कुछ नई कहानियों की उम्मीद की जा सकती है।
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उत्तर-आधुनिकता से आगे की कहानियां 
० पूनमचन्द गोदारा, गुसाईंसर बड़ा (श्रीडूंगरगढ़) बीकानेर

    कहानी मन के भावों का एक अभिनव एवम् अनुपम कोलाज है, जिसमें विविध रंग और पक्ष है। प्रतिभावान युवा कहानीकार सतीश छिम्पा का ‘वान्या अर दूजी कहानियां’ रोमांस से भरपूर प्रयोगवादी कहानियों का उनका पहला संग्रह है। आधुनिक राजस्थानी कहानी अब तक हिंदी अथवा अन्य भाषाओं की तुलना में सभ्यता का आवरण ओढ़े हुए है। जिस भाषा में अब भी परंपरावादी सोच के चलते खुलापन वर्जित-सा है। वहां संतुलन और संयमित रहकर दृश्यों को संकेत से संदर्भित करते हुए आगे बढ़ने की डेड लाइन पार करना जोखिम का काम है और यह जोखिम उठाते हैं सतीश छिम्पा।
इन कहानियों में रोमांस के समांतर बेरोजगारी, गरीबी, सामजिक विद्रूपताएं, निम्न मध्यवर्गीय़ सुख-दुःख के साथ जैसे वैश्विक समाज मार्क्सवाद दृष्टिकोण लिए साकार होता है। विश्व की बदलती व्यवस्थाएं, समाज के तुलनात्मक रूप में मानसिकताओं के साथ विचारधारा के द्वंद्व की खरी पड़ताल इन कहानियों में हुई है।
    ग्यारह कहानियों में लगभग सभी में रोमांस और प्रेम के विविध रंग है। कथ्य में युवा मन की रुमानियत इतनी खुलकर सामने आती है कि नायक अपनी नायिकाओं के साथ खुला रोमांस, सेक्स तो नायिकाओं का खुलापन, बिन ब्याहे प्रेग्नेंट होना, मां बनना आदि दृश्य खींचने में कहानीकार में कहीं कोई हिचक नजर नहीं आती। सब कुछ बेबाकी से कागज पर उतार कर आधुनिक परिवेश को उजागर किया गया है। वहीं कहानियों में सिगरेट, बीड़ी के कश है तो वोदका, व्हीस्की, जिन, बीयर, स्कोच भी आदि है। नशे की लत पूरी तरह भारतीय न होकर पाश्चात्य है, जो इन कहानियों में सहज प्रतीत होती है।
    ‘म्हैं बदळग्यो’ और ‘फोटु में चेग्वेरा मुळकै’ कहानियों में कथानायक बेरोजगारी के काले दिनों से जूझता नजर आता है। इन कहानियों लेखक को तंगहाली से हार अपने उसूलों से समझोता करना पड़ता है और वह कुछ फैसले भी लेता है। ‘जीवण गै कैनवास पर एक कोलाज’ आर्टिस्ट शेखर व सुचित्रा के प्रेम की एक सुखद अहसासों भरी कहानी है जो अपने अंजाम तक पहुंचती है। ‘म्हूं बेगो घर आस्युं’ कहानी आत्मकथ्यात्मक या संस्मरणात्मक प्रतीत होती है। यहां परम्परावादी और आधुनिक सोच का टकराव है। कहानीकार आधुनिकता को जीना चाहता और अपने आस-पास के परिवेश की भी आधुनिक कल्पना करता है।
    दो कहानियाँ बड़े बदलाव की ओर संकेत करती है। एक कहानी गे की है तो दूसरी है लेस्बीयन की। शायद इससे पहले राजस्थानी में इस विषय पर लिखने का प्रयास नहीं हुआ है। वैसे राजस्थान में समलैंगिकता को हिकारत की दृष्टि से ही देखा जाता है। भाषा में अट्रैक्शन है जो पाठक को सहज ही जोड़े रख सकने में सफल है। मुहावरों और लोकोक्तियों के सुंदर प्रयोग से नई भाषा यहां गढ़ती देख सकते हैं। गाली की चासनी का झीणा फ्लेवर इन कहानियों को और अधिक चाव से पढ़ने को मजबूर करता है। नख शिख वर्णन एवम् नायिका के दैहिक आवरण की परिकल्पना भी अजब गजब है। हाँ लगभग सभी कहानियों में कहानीकार नायिका के रूप लावण्य को लगभग समान ढंग से उकेरता है। यह समानता नायिका की वेशभूषा से लेकर उसकी अनुभूतियों तक में हावी है। कहानियों में का पृष्ठभूमि में सूरतगढ़ का परिवेश दिखाया गया है। हालांकि शहर को आधुनिक दिखाने की कोशिश की गई है, मगर शहर उतना मैच्योर नजर नही आता। यहां इस अंचल की आंचलिकता बहुत ही सुंदर ढंग से मुखरित हुई है। इस अंचल की वनस्पतियाँ, पेड़-पोधों, कॉलेज, आकाशवाणी आदि को शामिल करते हुए कहानियों में सूरतगढ़ को जीवंत कर दिया गया है ।
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अपने मुहावरे को गढ़ने में सफलता
प्रह्लाद राय पारीक, 18 एस पी डी, बड़ोपळ (सूरतगढ़)

    राजस्थानी के युवा कहानीकार सतीश छिम्पा का पहला कहानी-संग्रह ‘वान्या अर दूजी कहाणियां’ अपनी भाषा में नए तेवरों के साथ आधुनिक कहानी में अपनी जबर्दस्त उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल रहा है। राजस्थानी भाषा में यह संग्रह भाषा और शिल्प में नए प्रयोगों को लेकर आया है, कहानीकार ने आंचलिकता में वैश्विक कलेवर को प्रस्तुत किया है। सजीव आंचलिकता से सूरतगढ़ परिक्षेत्र की बोली और स्थानीय जनजीवन को इन कहानियों में जीवंत देखा जा सकता है।
    संग्रह ‘वान्य अर दूजी कहाणियां’ में पूंजीवाद से उत्पन्न विद्रूपताओं को भोगते युवा और प्रेम, पीड़ा, लापरवाही के त्रिकोण से उसके संघर्षरत है, वही वह मार्क्सवादी विचारधारा से सामाजिक परिवर्तनों के प्रति आश्वस्त भी है। आज जब दुनिया से साम्यवाद की विदाई की घोषणाएं हो चुकी है ऐसे समय में कहानीकार सतीश छिम्पा दृढ़ता से मार्क्सवादी के पुनरूत्थान का हामी इन कहानियों के द्वारा अपनी रचनाशीलता और वैचारिक बोध के बल पर अडिग खड़ा दिखाई देता है। वैश्विक साहित्यकारों चेखव, गोर्की, मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, फिदेल कास्त्रो, पाब्लो नेरूदा, ऑस्त्रोवस्की आदि अनेक नामों का इस कहानी संग्रह में आना राजस्थानी साहित्य में एक अलग तेवर और लेखन के संकेत हैं। कहानीकार का अपना अध्ययन, मनन और चिंतन है वहीं उसकी गहरी आस्था और सरोकार भी इन कहानियों में यत्र-तत्र कहें सर्वत्र विद्यमान है।
    ‘जीवण गै कैनवास पर एक कोलाज’ कहानी एक सुखद अहसास है, सुचित्रा-शेखर की यह कहानी समाजिक जड़ता तोड़ने वाली नवीन कथ्य के साथ प्रस्तुत की गई है। ‘वान्या’ कहानी में मूलकथा के साथ-साथ समानांतर अवांतरकथा में समलैंगिकता के बदलते संदर्भों को भारतीय परिपेक्ष्य में अनेक संकेतों के साथ हम देख सकते हैं। सतीश छिम्पा के इस संग्रह की अधिकांश कहानियां प्रयोगवादी सी लगती है। कहानियों में केवल एकांतिका का बोलबाला नहीं है। मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवादी परिवर्तनों की ओर जाती हुई ये कहानियां, जहां शोषण को अपने विकराल रूप में खड़ा करती है वहीं हमें सोचने-समझने पर भी प्रेरित और उद्वेलित भी करती है। आधुनिक समय में बदल रहे समय और समाज की शब्दावली में अनेक नवीन शब्दों और भाषा-शैली के घटकों का प्रयोग कहानीकार छिम्पा ने किया है। वह यहां कथानायक के रूप में ‘जीन’ और ‘ड्यूक’ की पैंट खरीदता है, वहीं वान्या को ‘टॉप’ पहनाता है। प्रगतिशीलता का यह नवीन दृष्टिकोण राजस्थानी भाषा में अनेक कहानीकारों में देखा जा सकता है किंतु मार्क्स से चेग्वेरा तक कहानी लाने वाले विरल कहानीकार भारतीय कहानी है और सतीश उन विरले युवा लेखकों में राजस्थानी के द्वार से शुमार है। वह अपने दौर की युवा कहानी में इस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है।
    सामंती पंरपरा में डूबे राजस्थानी कथा साहित्य में सतीश छिम्पा ने नवीन उत्साह का संचार करने का प्रयास किया है। स्त्री-पुरुष संबंधों को देह तक मानकर कई मान्यताओं को छिन्न-भिन्न करता हुआ यह युवा कहानीकार अभिजात्य वर्ग द्वारा निर्मित अनेक दीवारों को बिखेरता, चूर-चूर करता नजर आता है। आधुनिक राजस्थानी कहानी में इस संग्रह की हमारी युवा पीढ़ी के कहानीकारों की यात्रा में सबसे अलग पहचान इसलिए भी बनी है कि एक सक्षम कहानीकार के रूप में सतीश छिम्पा ने अपने मुहावरे को गढ़ने में सफलता हासिल की है।
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कहानी में नए स्वर, तेवर और बदलाव की धमक
० गौरीशंकर निमिवाळ, सूरतगढ़

    समकालीन राजस्थानी साहित्य की युवा रचनाशीलता में वर्तमान में युवा पीढ़ी के रचनाकारों ने बड़े बदलाव के साथ, नये तेवर और जिजीविषा के साथ रचनाकर्म को जीवंत बनाया है। कहानी पर नजर डालें तो एक पूरी परंपरा, एक नई पीढ़ी इस क्षेत्र में सतत रूप से सक्रिय हैं। राजस्थानी युवा कहानी में अनेक नामों के बीच एक सतीश छिम्पा एक महत्त्वपूर्ण नाम माना जा सकता है। हिंदी और राजस्थानी में सक्रिय सतीश छिंपा के रचनाकर्म की शुरुआत बेशक कविता से हुई पर बे एक रचनाकार के रूप में कहानियों में लोकप्रिय हुए हैं। उनका वैश्विक साहित्य का अनूठा अध्ययन है कहानियों में ताकत बनकर स्पष्ट झलकता है। उनका एक विचारधारा के प्रति झुकाव भी स्पष्ट देखा जा सकता है। अपनी लेखकीय प्रतिबद्धताओं के साथ-साथ ‘वान्य अर दूजी कहाणियां’ संग्रह में कहानियों का संप्रेषण दूर तक होता है। पाठक को उनकी कहानियों में उनके विचारों की घनघनाहट भी साफ सुनाई और दिखाई देती है। कहना होगा कि समकालीन राजस्थानी साहित्य में कहानी विधा को एक नई दिशा ‘वान्या अर दूजी कहानियां’ संग्रह से मिली है।
    कहानी में वैश्विक चिंतन और विचारधाराओं के बीच एक विचारधारा पर आस्था को कायम करते हुए सतीश की कलम ने उसे परोटा है। संग्रह की कहानियां को पढ़ते हुए पाठक अनुभव कर सकते हैं कि विश्व के महान विचारक मार्क्स एंजेल्स, लेनिन, स्टालिन, माओ, चे ग्वेरा, फिदेल कास्त्रो जैसे चरित्र नायक द्वारा राजस्थानी कहानी में नए बदलाव की धमक मानी जा सकती है। कहानी में सिमोन, माइकोवस्की, गोगोल अन्नाकारेनीना, गोर्की, सैमुअल बकेट, पाब्लो नेरुदा, अस्त्रोवस्की के साथ-साथ कानू सान्याल, चारु मजूमदार, जांगल संथाल, सुनीति कुमार घोष, हरभजन सिंह सोही आदि नाम पाठकों को इन रचनाकारों की ओर ले जाने की ताकत लिए हुए है ।
    यहां परंपरागत कहानी में बदलाव कथा-वस्तु, शिल्प और भाषा-शैली से रूपांतरित होता है। सर्वप्रथम कहानीकार का समर्पण वान्या को एक प्रतीक रूप में उसकी सामाजिकता को दर्शाता है। मनुष्य की सबसे प्यारी वस्तु (चीज) क्या हो सकती है? वह प्रेमिका, मां, बहन, पत्नी, बेटी या फिर पूरी प्रकृति भी हो सकती है। इसी एक प्रतीक रूप को संग्रह सतीश ने समर्पित किया है। इन कहानियों में कहानीकार ने नए बिंब प्रस्तुत किए हैं। उदाहरण के रूप में 'बे फुल दांई मैकता दिन हा' कहानी को देखा जा सकता है। कहानियों में छोटी-छोटी घटनाएं और संवाद जैसे पूरे दृश्य का रूपाकार करते हुए अपनी अलग ही अनुभूतियों से हमें जोड़ते हैं।
     कहानियों में रचनाकार का स्वयं का जीवन संघर्ष अपनी पीढ़ी के प्रतिनिधि पात्र के रूप में भी देखा जाना चाहिए। सतीश छिंपा का यह गद्य कहानियों में नवीन सूत्रपात है जिसमें वे अपने क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा के साथ यहां के बदलते जीवन और दिनचर्या को शब्दबद्ध करते हुए कुछ प्रश्न भी हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं। वान्या किसी स्वप्न और यर्थाथ के बीच पसरे रिक्त स्थान की भांति इन कहानियों में उपस्थित है। निसंदेह इस संग्रह से युवा कहानीकार सतीश छिम्पा एक मुकाम पर पहुंचे हैं। हमें उनके आगामी संग्रह का इंतजार है। वे इसके बाद और इससे आगे हमें कहां और किस दिशा में ले कर जाएंगे यह भविष्य का प्रश्न है।
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नई धारा की कहानियां
० मनोज कुमार स्वामी, सूरतगढ़
    सतीश छिम्पा राजस्थानी के युवा कहानीकार है। उनकी दृष्टि मार्क्सवादी चेतना से जुड़ी है। कहानीकर बेरोजगारी और आर्थिक संघर्ष से जूझते हुए ऐसे पात्रों का अपनी कहानियों में कथा नायक के रूप में प्रतिनिधित्व करता है। समाज में वर्ग भेद वर्तमान समय में उसी भयानक रूप में अपना अस्थित्व बनाए हुए है। बढ़ती जनसंख्या के बीच किसी भी युवा के सामने सबसे बड़ा संकट रोजगार का है। वह आर्थिक आभावों में अपने भविष्य को अंधकारमय पाता है। उसके सामने अस्थित्व और अस्मिता का सवाल विकराल बन जाता है। वह अपने संघर्ष में सफलता के सपने देखता और इन सपनों के बीच ही उसका प्रेम-रोमांस भी उसके मन में पलता है। उसकी बैद्धिकता और अपने मौलिक होने के अहसास में द्वंद्व चलता है। वह दुनिया की बड़ी बड़ी क्रांतियों से प्रेरणा लेता है। ऐसी ही कुछ वैचारिक भावभूमि के साथ राजस्थानी युवा लेखक सतीश छिम्पा का नाम लेखन हमारे समक्ष है।
    सतीश छिम्पा का पहला कहानी संग्रह ‘वान्य अर दूजी कहानियां’ पढ़ते हुए लगेगा कि इन कहानियों में नयापन है। जो परंपरागत कहानी से बिल्कुल अलग कहा जा सकता है। यहां कहानी के रूढ़ ढांचे और विषयगत घर-परिवार से जुड़ी कहानियों से इतर कुछ नए विषयों को नए शिल्प में प्रस्तुत करने का उम्दा प्रयास है। उदाहरण के लिए कहानी ‘साइकिल वाळी छोरी’ की बात करें जिस में सतीश ने एक नई कथा-शैली प्रयुक्त करते हुए, अपने शहर को जैसे कहानी में सजीव किया है। यह एक शहर का मानवीयकरण है। पुष्टि के लिए इसी कहानी की कुछ पंक्तियों का अनुवाद प्रस्तुत है- ‘सूरतगढ़ मेरा कस्बा, यहां कुछ भी छुपा नहीं रहता। शहर की आंखें किसी दूरबीन की भांति एक ऐसा सूक्ष्मदर्शी है, जो खोल को पारदर्शी बना कर- भीतर की चीजों को नग्न रूप में देख लेता है। आदिम रूप में।’
    कहानी में ठहराव और एकरसता की बात कहने वालों के सामने सतीश छिम्पा की कहानियां एक उदाहरण है कि परंपरागत कहानी के कथ्य और शिल्प को तोड़ते हुए नए शिल्प में भी कहानियां लिखी जा सकती है। आज के युवा जिस बेरोजगारी और आर्थिक संत्रास से जूझ रहे हैं उसके साथ-साथ कस्बाई मानसिकता का भी जबरदस्त तरीके से वर्णन इन कहानियों में मिलता है। यह संग्रह समकालीन राजस्थानी कहानी में इसलिए भी अलग पहचाना जाएगा कि इसमें लगभग सभी कहानियां रोमांस और प्रेम की केंद्रीय सत्ता से संचालित है। कहानियों में यर्थाथ के नाम पर प्रयुक्त गालियों की चासनी से जो गद्य का रूप सामने आया है वह पठनीय तो अवश्य है किंतु परंपरागत राजस्थानी कहानी और संस्कृति से जुदा है। इसके सकारात्मक अथवा नकारात्मक प्रभाव और आकलन को भविष्य पर छोड़ देना चाहिए।
    सतीश छिम्पा का अपना अध्ययन, मनन और चिंतन है। वे बेशक एक विचारधारा को पोषित करते हैं फिर भी वे अपने समाज और समय से जुड़ते हुए अपनी भाषा और शैली के कारण निजी पहचान बनाते हैं। यह सुखद आश्चर्य है कि वे अपने पहले ही संग्रह में बहुत बड़ा जोखिम उठाते है। अब देखना यह है कि वे अपनी प्रयोगधर्मिता को आगे किस मुकाम तक ले जाते हैं। वे अपने नियत मुकाम पर पहुंचे, ऐसी मंगलकामनाएं।
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वान्या अर दूजी कहाणियां (7) राजेश चढ्ड़ा, राजू सरासर, मधु आचार्य ‘आशावादी', हरिमोहन सारस्वत
कथा-2 (5) संजू श्रीमाली, बुलाकी शर्मा, मधु आचार्य ‘आशावादी’, मदन गोपाल लढ़ा, राजू राम बिजारणियां, सतपाल खाती
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संपादक : डॉ. नीरज दइया

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