सोमवार, 18 सितंबर 2017

अरविन्द सिंह आशिया का कहानी संग्रह : ‘‘कथा-2"

कथा- 2 (राजस्थानी कहानी संग्रह) अरविन्द सिंह आशिया / संस्करण : 2009 / पृष्ठ : 112 / मूल्य : 99 रुपये / प्रकाशक : कथा प्रकाशन, उदयपुर (मो. 941338066)
अरविन्द सिंह आशिया
जन्म : 6 दिसम्बर, 1964 सर्वाधिक चर्चित और सक्रिय कहानीकार। कविता-कहानी और अनुवाद के साथ विविध विधाओं में लेखन। राजस्थानी में दो कहानी संग्रह- ‘कथा-1’ , ‘कथा-2' तथा एक कविता संग्रह- ‘कांकिड़ौ’ प्रकाशित। रचनाओं के अनेक भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित। राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर से मुरलीधर व्यास कथा पुरस्कार-2003 से सम्मानित। आप साहित्य अकादेमी नई दिल्ली के परामर्श मंडल के सदस्य भी रहे हैं। हिंदी में ‘कचनार’ और ‘अंतिम योद्धा’ उपन्यास चर्चित।
संपर्क : उदयपुर
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सघन संवेदनाओं की अनुपम प्रस्तुति
० डॉ.सुरेश सालवी, उदयपुर

कहानी संग्रह ‘कथा-2’ की 11 कहानियां में डॉ. अरविन्द सिंह आशिया ने अनेक विषयों को समेटा है। संग्रह की कहानियों के कथानक में व्यापकता और गहनता देख सकते हैं। कहानी ‘सवासेर’ सन्देश देती है कि हमेशा अपनी बुद्धि पर घमण्ड़ नहीं करना चाहिए। कभी-कभी वक्त ऐसा भी आता है कि शेर को सवा शेर मिल जाता है। मोहन जो कि भंगार का धन्धा करता है। कम रुपये में कबाड़ लेकर दूसरों को अधिक में बेचना उसकी फितरत है। मोहन भीमा से एक पुरानी सन्दूक का सौदा एक हजार में तय कर कहता है कि इसकी लकड़ी जलाने के काम आयेगी। वह सोचता है कि इसको ठीक करवा कर अच्छे दामों में बेचूंगा। जब मोहन अपनी कार के टायर का पंचर निकालने जाता है तो भीमा पीछे से सन्दूक तूड़वा कर लकड़ी इकट्ठी करवा कर बंधवा देता है। इस प्रकार शीर्षक का संकेत सार्थक होता है।
‘अेक हाकम री मिरतु’ कहानी में कहानीकार ने समाज में फैली गंदी राजनीति का चित्रण किया है। एक्स, वाई, जेड़ और पी पात्रों के माध्यम से कथा को रोचकता प्रदान की गई है। आज की प्रशासनिक व्यवस्था को उजागर किया गया है। ‘बॉंझ’ कहानी नारी हृदय की पीड़ा को उजागर करती है। अब भी समाज में पुत्र विहीन नारी को हेय दृष्टि से देखा जाता है। नारी की व्यथा-कथा उजागर करने के साथ कहानी पुलिस प्रशासन पर भी आक्षेप करती है। ‘1947’ कहानी में कहानीकार ने अपने उद्देश्य को ऐतिहासिक रूप में उद्गाटित करते हुए आज के समाज को सम्प्रदायवाद और जातिवाद जैसी समस्याओं से रू-ब-रू कराया है। 1947 के बंटवारे के समय भाटिया अपनी पुत्री लाहौर में खो देता है परन्तु शिकारपुर आने पर दहशतगर्दों से शबाना को बचाकर अपनी पुत्री बनाकर सच्ची मानवता का सन्देश देता है। आज के समाज में मनुष्यता से परे कोई धर्म नही होता है।
‘पारायण’ कहानी के माध्यम से यथार्थ से परे जीवन मूल्यों पर सवाल किया गया है कि आज भी समाज में लोग साधु-संतों के पाखंड से भरे पड़े है। साधु के कहने पर कहानी में सभी अपने पिता की मौत की प्रतीक्षा में है। जबकि बुजुर्ग मौत से दूर है। एक तरफ धर्म के रूप का दिखावा मात्र रामायण पाठ करने में बताया गया है तो दूसरी ओर शराब आदि का रूप भी कहानी में उजागर हुआ है। कथनी-करनी और बंटवारे के साथ लोभ का यथार्थ चित्रण कहानी में सघन संवेदनाओं के साथ प्रकट हुआ है।
‘बाथरुम स्लिपर्स’’ कहानी के माध्यम से कहानीकार ने मिस्टर मेहरा और मिसेज यू.आर.मेहरा के माध्यम से दिखावटी जीवन के साथ फैशन परस्ती जीवन के साथ, ऐसो-आराम एवं फिजूलखर्ची को आड़े हाथों लिया है। यह सच्चाई है कि वर्तमान समय में बुर्जुगों का समाज से सम्मान घटता जा रहा है, इसी तथ्य को कहानी सुंदर ढंग से उजागर करती है।
संग्रह में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिकता के साथ ऐतिहासिक आदि कहानियां बानगी रूप संकलित है। कहानीकार ने यदा-कदा राजस्थानी के साथ, सहज प्रवाह में हिन्दी एवं अंग्रजी वाक्यों का भी रोचक प्रयोग किया है। कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कहानीकार डॉ.अरविन्द सिंह आसिया एक सफल कहानीकार है।
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उत्तर आधुनिकता का वंदन द्वार
चेतन औदिच्य, उदयपुर
    ‘कथा-दो’ कहानी संग्रह से गुजरने के बाद यह कहना सर्वथा उचित है कि हिंदी और राजस्थानी पट्टी के कथा-आकाश में अरविंद सिंह आशिया की कहानियां में ऐसा उजास है जो न केवल अपने शिल्प द्वारा आकर्षित करता है वरन, कहानी की नई जमीन हरी करता है। संग्रह की 11 कहानियों में संवेदना, घटनाक्रम और बुनावट में अभिनव प्रयोग हैं। सभी कहानियां अपने समय के यथार्थ और परिवेश को जीवंत करती वर्तमान होती हैं। कहानियों के रचाव का उपक्रम मौलिकता की नव-भंगिमाएं लिए हैं जो समकालीन कथा-दौर में अपना अलग स्थान बनाने का सामर्थ्य रखती हैं। कहानी के विन्यास के संयोजन की यह विशेषता है कि वह पाठक को पात्र-घटना से एकाकार करा कर देश-काल से अतीत कर देता है; और उसे मानवीय औदात्य की महनीय भूमि पर ला खड़ा करता है। यही इन कहानियों की सर्वोच्च उपलब्धि भी है। यदि इसे कसौटी माना जाए तो अरविंद सिंह आशिया प्रौढ़ एवं प्रगल्भ कहानियों के सर्जक के रूप में स्थापित होते हैं।
संग्रह की कहानियां मनुष्य की स्वयं से जूझ तो है ही साथ ही जीवन के स्वार्थ, संघर्ष एवं प्रपंच को बहुत प्रभावी रूप में प्रस्तुत करती है, पाठक के भीतर तक पैठ बनाती है। आधुनिक भाषा-शिल्प और उसका प्रवाह अरविंद सिंह का अपना है। कथ्य के विस्तार में हम उत्तर आधुनिकता की अनेक विशेषताएं इन कहानियों में देख पाते हैं। कहानियों का घटनाक्रम पर रचनाकार का दृष्टिकोण महज अभिधात्मक ही नहीं है अपितु , चिंतनपरक तथा गहरा व्यंजक है। इस चिंतनपरक दृष्टि के कारण ही कहानी में किसी एक खंड-घटना का कलेवर भी अद्भुत संसार रच देता है। कहानी की समकालीन धारा में यह विरल एवं उल्लेखनीय है।
सवासेर, बांझ, 1947, एकादशी, बाथरूम स्लीपर आदि कहानियां गहरी संवेदनाओं के साथ व्यापक फलक लिए हुए है। कहानी में घटनाक्रम का नाटकीय विन्यास लेखक की प्रयोगमूलक अभिवृत्ति का उल्लेखनीय पक्ष है। जैसे बांझ कहानी की नायिका पेमा के दस बरसों से कोई संतान नहीं है। पेमा का पति उसकी निस्संतति का जिम्मेदार पेमा को ठहराता है। प्रतिदिन की कलह की परिणति में पेमा के हाथों अपने पति की हत्या हो जाती है। पुलिस-हिरासत में पेमा का बलात्कार होता है और वह गर्भवती हो जाती है... न्यायालय के समक्ष पेमा का ठहाका लगाना और यह कहना कि “मैं बांझ नहीं हूं।” कहानी का चरम है।
इसी प्रकार कहानी '1947' भारत-पाकिस्तान के विभाजन की त्रासदी और मानवीय संवेदनाओं पर केंद्रित लंबी कहानी है जिसमें लेखक की व्यापक दृष्टि और संश्लिष्ट विषय का विश्लेषनात्मक निकष प्रस्तुत हुआ है। कुत्ता कहानी में एक अहंकारी अफसर द्वारा कुत्ते को मरवा देने पर उसकी कुतिया द्वारा अनशन करना लालफीताशाही की तानाशाही और आम आदमी की निरीहता को अभिव्यंजित करती है। लेखक द्वारा आदमी को कुत्ते का प्रतीक देना, कहानी-कला में नया रंग भरने जैसा है। एकादशी कहानी द्वारा गरीबी का बहुत बारीक एवं संवेदनात्मक पक्ष उजागर होता है। गरीब पुजारी को जब दिन-भर कुछ खाने को नहीं मिलता है तो वह तुलसी के पत्ते और पानी पीकर कहता है कि "आज एकादशी है, तुलसी खाने से मोक्ष मिलता है। " मन को मनाने वाले मनोविज्ञान-कक्ष में यह कहानी मानो करुणा का छलछलाता कलश है।
इस प्रकार स्तवक कहानी संग्रह ‘कथा-दो’ कहानीकार की नवदीठ अभूतियों की मंजूषा है, जिसमें मानवीय संबंधों और समय की धारा का उद्दाम आड़ोलन बहुत ही अनुशासन में अपनी उपस्थिति देता है। कहा जा सकता है कि संग्रह की कहानियां महज कहानियां नहीं अपितु उससे कहीं आगे, कहानी लेखन में उत्तर आधुनिकता का वंदन द्वार है। यह संग्रह कहानी कला की अनेक आश्वस्त्तियां और समृद्धि लेकर आया है।
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अपनी समस्याओं से जूझते किरदार 
० डा. कुसुम धनावत, उदयपुर

    अरविंद सिंह आशिया आज के राजस्थानी साहित्यकारों में एक जाना पहचाना नाम है।  इनकी रचनाओं की विविधता इनकी विशेषता है। आपका कहानी संग्रह ‘कथा-2’ विविध प्रकार के फूलों की तरह है। हर कहानी अपने अलग कन्सेप्ट के कारण प्रभावित करती है। कहीं वे आपके दिल के कोमल हिस्से को छूती है तो कभी मन को झकझोर कर बने बनाए ढर्रे पर चलने के बजाय उनके विरूद्ध खडे  होने को प्रेरित करती है। अरविंद कहीं अपनी तीक्ष्ण लेखनी से हमें सोचने, विचारने व सुधरने की अपील करते हैं तो कहीं वे स्वयं किरदार के साथ जीते महसूस होते हैं। अरविंद की यही बात इन्हे सबसे अलग बनाती है।
    अरविंद आशिया की सबसे अच्छी बात तो यह है कि वे अपने किरदार को बहुत अच्छे से पहचानते हैं। आशिया स्वयं अपने किरदार के साथ उनकी समस्याओं से जूझते हैं व उनके साथ संघर्ष करते नज़र आते हैं। यही कारण है कि पाठक भी अपने को रोक नहीं पाता व सहज ही उस किरदार से जुड जाता है। आपके किरदार भी परंपरागत ढर्रे से हट कर उससे विद्रोह करते नज़र आते हैं। कहानियों के किरदार एक संघर्ष से जूझते हैं जो कहानी के अंत के समीप अपने चरमोत्कर्ष पर होता है।
    अरविंद की कहानियां कई पहलुओं को सामने रखती हैं। अनेकानेक पहलुओं पर पुनर्विचार करने की अपील करतीं हैं। ‘बांझ’ कहानी के अनुसार किसी महिला को बार बार ‘बांझ’ शब्द से प्रताडित करना तथा  उसके मां न बन पाने का उपहास करना उसके कोमल मन पर दुष्कर्म जितना ही गहरा प्रभाव डाल सकता है व कभी कभी तो उससे भी गहरा। कहानी में पेमा के अंतरमन की व्यथा को पूरी तरह उकेरा गया है। बच्चे न हो पाना, लोगों द्वारा बांझ कहा जाना,  समाज द्वारा इसका उपहास किया जाना, पति द्वारा इसके लिये प्रताडित करना, चूडवेलन, सिकोतरी, डायन जैसे शब्दों का उसके लिये प्रयोग किया जाना, स्त्री को उपभोग का पात्र एवं बच्चे पैदा करने की मशीन समझना इस सब ने पेमा को कितना खोखला कर दिया था, इसका बहुत ही मार्मिक वर्णन कहानी में है।
    अरविंद सिंह आशिया के कहानी संग्रह ‘कथा-2’ में हमें लेखनी की परंपरागत विधा से हट कर कुछ कहानियों में नए प्रयोग भी देखने को मिले। ‘अेक हाकम री मिरतु’ कहानी में ‘उण सेर मांय तीन मिनख रेवता हा।........ क्यूं कै रैवसी री परिभासा में आवै वैइज रैवणिया।’ कथन हमें कई पहलुओं पर सोचने किरदार विवश करता है। जनप्रतिनिधियों द्वारा अपनी सुविधानुसार अफसरशाही का प्रयोग करना व अपने अनुकूलन होने पर ट्रांसफर करा देना तो वास्तव में अलिखित नियम सा हो गया है। इमानदार अफसरों को अपराधियों की तरह ही प्रताडित किया जी रहा है। इन सब बातों को ‘एक्स’, ‘वाय’, ‘जेड’ एवं ‘पी’ के माध्यम से एकदम जीवंत उकेरा है।
    ‘कुतौ’ कहानी अफसरशाही के मद में उन्मत बडे औहदेदारों पर सटीक व्यंग करती है। आधुनिक जीवनशैली में बुजुर्गों की दशा पर व्यंग करती कहानी ‘बाथरूम स्लीपर्स’,  स्वार्थीपन पर व्यंग करती कहानी ‘पारायण’ अरविंद आशिया के प्रयोग को पूरी तरह सफल साबित करती है। कहानी ‘गत’ व ‘ग्यारस’ तो पाठक को अपने साथ बहा कर ले जाती है। कहानी के शब्द स्वयं ही कहानी के काल व क्षेत्र में खींच लेते हैं। क्षेत्र व की खुशबू कहानी से आप ही आती है।
    कहानी की विषयवस्तु लेखक कहानी पर ही छोड देते हैं। कहानियों के किरदार स्वयं अपनी ही समस्याओं से जूझते हुए कुछ सीख लेते हैं व अनुभव प्राप्त करते हैं, इस प्रकार जो सीख या अनुभव वे प्राप्त करते हैं वही कहानी की विषयवस्तु होती है जिसे पाठक स्वयं ही समझ जाता है। यही एक अच्छे साहित्यकार का सूचक है कि वह ज्यादा उपदेशात्मक होने के बजाय स्वयं पाठक को झकझोर कर विचार करती पर मजबूर करते हैं।
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कहन में अनूठी कहानियां
सत्यनारायण सोनी, परलीका (हनुमानगढ़)
किसी भी रचनाकार को उसका अंदाजे-बयां और कथ्यगत नवीनता एक अलग पहचान देते हैं। इस दृष्टि से अरविंद सिंह आशिया राजस्थानी कहानीकारों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में कामयाब हुए हैं। ‘कथा-2’ उनका दूसरा कहानी संग्रह है। इसमें 11 कहानियों को शामिल किया गया है। शुरुआती तीन कहानियां कहन की दृष्टि से अनूठी हैं। इन कहानियों के माध्यम से वे बिज्जी के लहजे और शिल्प को आगे बढ़ाते प्रतीत होते हैं। इन तीनों कहानियों में लेखक किसी मंजे हुए बातपोश के अंदाज में कहानी कहता हुआ-सा प्रतीत होता है। लेखक कहावतों व मुहावरों के जरिए चरित्र-चित्रण करने का हुनर रखता है- ‘‘मोवनिया काॅपरेटी वाळो किसौ? के गायां रै कीड़ा घालै जिसौ। एक नम्बर रौ अल्लाम। पाणी बतावै वठै कादौ ई को लाधै नीं। उणरा उडायोड़ा रूंखड़ां माथै तक नीं बैठै। पाणी मांयनै सूं हाथ बारै काढै पण भीजण को दै नीं। जिण रूंख री छियां बैठै वौ सूख जावै। अैंमदिया री टोपी मैंमदिया माथै मेलण में उस्ताद। टणकां-टणकां नै इसी टोपी पैरावै के ठा नीं पड़ै। अठै वड़ियोड़ो वठै नीसरै। दूखै पेट अर बतावै माथौ।’’
‘सवासेर’ अपने अप्रत्याशित अंत से चमत्कृत कर देती है। ग्रामीणों के सरल स्वभाव और वणिक की चतुराई को बड़ी बारीकी से बुनने में कामयाब हुए हैं कहानीकार। ‘अेक हाकम री मिरतू’ अेक कस्बे की संकीर्ण राजनीति की कथा है। राजनीतिक चेतना के अभाव में आमजन की हालत भेड़ सरीखी है और वह राजनीति का मोहरा बना रहता है। ‘बांझ’ काम मनोविज्ञान तथा स्त्री सशक्तीकरण की अच्छी कहानी है। इस कहानी में नायिका के यौवन-उभार पर प्रकृति के उपादानों के आकर्षित होने को भी बड़े अनूठे ढंग से चित्रित किया गया है- ‘‘पिणघट माथलौ पीपळ ई पण थोड़ौ उचक्यो। कागलौ उडग्यौ- ....‘कांव‘......। पेमां, जाणै सैंबूलो पीचकौ। बळदियां रै गळा की घंट्यां, पीपळ री फड़-फड़, पाणी री खळ-खळ, अरट रही चरड़ चूं। पीचकै रै उपर बण्योड़ी गोळ-गोळ दो टंक्यां जीवण रो पाणी उफणै।’’
‘1947’ विभाजन की त्रासदी पर लिखी गई कहानियों की संख्या में इजाफा करती है। ‘कुत्तौ’ लोकतंत्र पर करारा व्यंग्य है। इस कहानी में कुत्ते के मारफत आम आदमी की संघर्ष-भावना व्यक्त हुई है। ‘पारायण’ के माध्यम से कहानीकार एक परिवार के बहाने भारतीय परिवारों की सामाजिक व्यवस्था की हकीकत दर्शाते हैं। ‘बाथरूम स्लीपर’ तथाकथित शिक्षित तथा अभिजातीय लोगों के दिखावे, लोक के प्रति उनकी हीन-दृष्टि तथा परिवार के बड़े-बुजुर्गों की उपेक्षा को व्यक्त करती है। वहीं ‘न्यारा-न्यारा आबा’ हाई प्रोफाइल परिवारों में घटते रागात्मक संबंधों की कथा है। ‘गत’ की हंजा भुआ तथा ‘बुझागड़ काकौ’ का मगनौ बा ग्रामीण जनजीवन में रचे-बसे चरित्र हैं। दोनों ही कहानियां ग्राम्य जीवन की संवेदनाओं को उकेरती हैं। मगनो बा जैसे हकीम आधुनिक चिकित्सा पद्धत्तियों को भी दूर बैठाते हैं।
स्ंग्रह की सभी कहानियां पठनीयता से सराबोर हैं। छोटे-छोटे वाक्य और नाटकीय शैली इन कहानियों की एक और खूबी है। आशिया के पास बात कहने का सलीका है। अपना एक ढंग उन्होंने खुद विकसित किया है। कहा जा सकता है कि सर्वथा नवीन कथ्य को अपने मौलिक शिल्प में ढालने में वे निपुण हैं, मगर यही निपुणता शीर्षक-लेखन व प्रूफ-रीडिंग में रही होती तो वे राजस्थानी के चोटी के कथाकारों में अपना मुकाम हासिल कर लेते।
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देखने-परखने का अभिनव दृष्टिकोण और विषयगत नवीनता
डॉ. नीरज दइया, बीकानेर
राजस्थान के बदलते सांस्कृतिक जनजीवन, मूल्यों और भाषा को कहानीकार अरविन्द सिंह आशिया अपने दूसरे कहानी संग्रह ‘कथा-2' की कहानियों में साकार करते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि उनकी कहानियों में स्थाई भाव के रूप में व्यंग्य किसी माल के धागे की भांति कहानियों की अंतर्वस्तु में गूंथा मिलता है। वे बदलती विचारधाराओं को बदलती भाषा के रूप से चिह्नित करते हुए कहानियों में राजस्थानी के साथ अंग्रेजी-हिंदी शब्दों को प्रतुक्त करते हैं तो यहां का आधुनिकता की दिशा में गति करता जनजीवन मूर्त होता है। संभवतः कहानीकार की यह चिंता भी वाजिब है कि हमारे सांस्कृतिक जीवन में गड़बड़ाते मूल्यों के साथ हमारी लोकभाषा की महक भी लुप्त होती जा रही हैं। संग्रह की कहानियों में जीवन की विभिन्न स्थितियों को देखने-परखने का दृष्टिकोण और विषयगत नवीनता हमें प्रभावित करती है।
पहली कहानी ‘सावासेर’ में कवाड़ सेठ के साथ घटित घटना को कहने का अंदाज किसी बातपोस की भांति है, जिससे त्रासदी स्मरणीय हो जाती है। व्यक्ति और चरित्र को किसी एक चेहरे के बंधन से मुक्त करते हुए एक्स, वाई और जेड के रूप में हम ‘एक हाकम री मिरतू’ में देखते हुए अपने-अपने देखे चरित्रों का स्मरण करते हैं। यह कहानी की सार्थकता है कि वह हमसे जुड़ती चली जाती है। कहानी ‘बांझ’ में संवाद शैली का प्रयोग है, तो साथ ही स्त्री-पुरुष के भेद और सामाजिक खामियों को जो अब तक हमारे समाज में घर किए हुए हैं पर बेहद मार्मिकता के साथ व्यंग्य किया गया है।
कहानी ‘1947’ एक लंबी कहानी है जो देश की आजादी से जुड़ी है। यह हिंदु-मुसलमान दंगों और अंतस पर धातों-प्रतिधातों के बाद भी प्रीत को हरेपन को उजागर करती है। कुछ कहानियों में तो अरविंद सिंह आशिया धर्म और संस्कारों के कारण कष्ट पाती आत्मा को जैसे शरीरों से बाहर निकाल कर कहानी में अपने पाठकों के आगे परोस देते हैं। ‘इग्यारस’ का मोवनदास हो या फिर ‘गत’ की हंजा भुआ हमें अपनी आस्था और अडिग विश्वास के बल पर जैसे जीत लेते हैं। ‘पारायण’ का रामायण पाठ अथवा ‘बाथरूम स्लिपर्स का थीम एक्स्टेम्पोर दोनों ही स्थितियों में हमारा सांस्कृतिक दर्प जैसे चूर-चूर होता है। हम सोचने को विवश होते हैं कि इतने विकास और इस आधुनिकता की चकाचौंध में आखिर हम पहुंचे कहां है?
‘न्यारा-न्यारा आबा’ में अनिल के मेल बॉक्स में मिले तीन पत्र जैसे उसके सामने तीन कहानियों को खोलते हैं। यह कहानी शैल्पिक प्रयोग के साथ ही बदलते जीवन में नाटकीय जीवन और वास्तविक जीवन का मर्म भी उजागर करती है। निश्चय ही राजस्थानी कहानी के मार्फत भारतीय कहानी में यह उम्मीद भरा हस्तक्षेप है। इन सभी कहानियों में जहां विषयगत नवनीता है वहीं एक सामान्य और प्रचलित विषय से इतर कहानियों में प्रतिनिधि चरित्रों और पात्रों द्वारा सराहनीय सार्थक प्रयास प्रचुर मात्रा में नजर आते हैं।
कहानी के लिए कथा शब्द प्रयुक्त करते हुए संभतः अरविन्द हमारी लौकिक परंपरा से जुड़ने का अहसास कराते हैं किंतु संग्रह में सभी कहानियां आधुनिक है। आशा है वे भविष्य में ‘कथा’ के मोह से मुक्त होकर शीर्षक पर विशेष ध्यान देंगे। कहानियों की व्यंजना शीर्षक में भी साकार होनी चाहिए।
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समय व समाज का जीवंत दस्तावेज
० डॉ. मदन गोपाल लढ़ा, महाजन (बीकानेर)
साहित्य अपने समय व समाज का जीवंत दस्तावेज होता है। कहानी विधा में समय की धड़कन को स्पष्ट रूप से सुना जा सकता है। कहानीकार अरविन्द सिंह आशिया की कहानियों में समाज के ताने-बाने के साथ वक्त के मुताबिक आ रहे बदलावों का भी विश्वसनीय अंकन हुआ है। आशिया राजस्थानी के उन चुनिंदा कहानीकारों में से एक हैं जिन्होंने कथ्य के स्तर पर नूतन व विविधतापूर्ण विषयों पर कलम चलाकर कहानी विधा को समृद्ध किया है। उनके कहानी संग्रह ‘कथा-दो’ में जहां परम्परागत देहाती जीवन के विश्वसनीय ब्यौरे दर्ज हुए हैं वहीं एयरपोर्ट, किटी-पार्टियों, तकनीक के साए में पनपी आभासी दुनिया के अनछुए चित्र भी मौजूद हैं। परम्परा एवं आधुनिकता का यह जोड़ उनको राजस्थानी कहानी यात्रा में अलग पहचान दिलाने में सफल हुआ है।
आलोच्य संग्रह की पहली कहानी ‘सवासेर’ धन-मोह से ग्रस्त व्यक्ति की चालाकियां के साथ ‘एंटीक’ सामान के खरीद-फरोख्त व ग्रामीण कमेरे वर्ग का भोलापन सहज रूप में प्रकाशित हुआ है। यहां ‘मोवनियो कॉपरेटी वालो’ केवल एक कबाड़ व्यवसायी भर नहीं रहता बल्कि मुनाफाखोर बाजार व्यवस्था का प्रतिनिधि बन जाता है। ‘बाथरूम स्लिपर्स’ को आशिया की स्मरणीय कहानियों में शामिल माना जा सकता है, जिसमें नगरीय जीवन शैली में हाशिये पर आ चुके बुजुर्गों की पीड़ा को नितांत नए रूप में अभिव्यक्त किया गया है। प्रसंगवश मॉडर्न दिखने की चाह में जड़ों से कटते अभिजात्य वर्ग के ढकोसले भी इस कहानी द्वारा सामने आए हैं। ‘‘मुझे तो यह समझ में नहीं आता कि ये बुढ्ढे आखिर बाथरूम में स्लिप होकर ही क्यूं हड्डियां तुड़वाते है। हजार बार मना करो तो भी बेपरवाही बरतते है और नतीजा हम पीछे वाले भुगतते हैं।’’ मिसेज मेहरा का यह कथन उच्च वर्ग की मानसिकता को उजागर करता है।
‘गत’ व ‘बांझ’ कहानियां स्त्री जीवन की पीड़ाओं व संघर्षों को प्रकाशित करती है। ‘गत’ की हंजा भुआ गरीबी और अकेलेपन से जूझती हुई भी अपनी संवेदना को मरने नहीं देती। ‘बांझ’ में पेमां पर पुलिसिया अत्याचार त्रासद है, वहीं सामाजिक ढांचा भी स्त्री को उपभोग की वस्तु से अधिक नहीं आंकता। संग्रह की अन्य कहानियां भी हमारे इर्द-गिर्द पसरी विसंगतियों को उजागर करती है।
अरविन्द सिंह आशिया का कहानीकार कस्बों-शहरों में रहने वाले मध्यम व उच्च वर्ग के जीवन विधान को भी कहानियों में उजागर करता है। ऐसा करके वे राजस्थानी कहानी को गांव-देहात के परम्परागत दायरे से बाहर निकालते हैं। इस प्रक्रिया में उन्होंने पात्रों के संवादों में अंग्रेजी के लम्बे-लम्बे वाक्यों का बेहिचक प्रयोग किया है। शिल्प के स्तर पर उनकी कहानियों में अभी भी संभावना है, खासकर शीर्षक व कसावट को लेकर। बावजूद इसके निर्विवाद यह कहा जा सकता है कि अरविन्द सिंह आशिया ने राजस्थानी कहानी की नई जमीन तोड़ी है। विषयगत विविधता, परिवेश का जीवंत अंकन एवं कथ्यगत प्रयोग उनको राजस्थानी के समकालीन कहानीकारों में भीड़ से अलगाते हैं। उनके अब तक प्रकाशित दोनों संग्रह उनसे बड़ी उम्मीदें जगाते हैं। आशा की जा सकती है कि वे आगामी रचनाओं से कहानी परम्परा को उस ऊंचाई तक ले जाएंगे जहां भारतीय भाषाओं के बीच उसकी सशक्त उपस्थिति दर्ज होगी।
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तिरोहित होती संवेदनाओं की कहानियां...
० डॉ. संजू श्रीमाली, बीकानेर
    अरविंद सिंह आशिया की कहानियों को पढ़ते हुए एक बार बार ऐसा लगता है कि कहानीकार का सोच और अनुभव फलक अत्यंत व्यापक है। कहानियों का आरंभ पढ़ते हुए हमें परंपरागत बात शैली का अहसास भीतर किसी छोर को छूता प्रतीत होता है। दादी-नानी की कहानियों जैसी बातपोशी से संपृक्त ये पठनीय कहानियां हैं।
    संग्रह की पहली कहानी ‘सवासेर’ अपनी राजस्थानी ठसक और मर्म से हृदयस्पर्शी बन पड़ी है। इसमें कथानायक मोवनिया एंटीक पीस के चक्कर में ठगा जाता है। खुद को बड़ा होशियार समझने वाला वह अनपढ़, गंवार, अबूझ दिखवाले व्यक्तियों से मात खा जाता है। भाषा की व्यंग्यात्मकता कहानी में रोचकता पैदा करती है तो शैली में लोककथा जैसी एक अनोखी त्वरा से अंत तक आते आते अविस्मरणीय बन जाती है।
    ‘एक हाकम री मिरतु’ में कहानीकार की यह खूबी है कि वह बिना किसी पार्टी सत्ता का नाम लिए बड़ी कुशलता से सब कुछ कह देता है। एक्स, वाइ, जेड नामक राजनेता और ईमानदार एस.पी. प्रतीकात्मक रूप में चित्रित किए गए हैं जो किसी भी शहर में पाए जा सकते हैं। कहानीकार यह बताने में सफल हुआ है कि किस भांति रसूखदारों के आगे ईमानदारी वर्तमान दौर में हारने को विवश है। ‘बांझ’ कहानी समाज के ठाए ठेकेदारों, नियमों, पितृसत्ता को चुनौती देती है। इसमें कथा नायिका पेमां जैसे स्त्रीत्व की जीत के उद्घोष के साथ कोर्ट में पेशी के समय चिल्लाकर कहती है- ‘म्हूं बांझ कोनी’। जीवन में सतत त्रासदी भोगने वाली पेमां कहानी के अंत में पुरुषत्व और रीति-रिवाजों के साथ पुलिस की भी कलई खोल देती है। ‘बांझ’ शब्द स्त्री के स्त्रीत्व पर इस कदर कलंक है कि वह अपने साथ हुआ अन्याय, अत्याचार और सब कुछ भूलकर जैसे अतीत से विद्रोह करती है।
    ‘1947’ कहानी में भारत-पाक बंटवारे की दास्तां है। रानीतिज्ञों की बंटवारे के नाम पर सिकती रोटियां और तन-मन-धन से टूटती जनता का सुंदर सफल चित्रण इस कहानी में मिलता है। ‘कुत्तौ’ कहानी का आरंभ रोमांचित करता है। कहानीकार यह बताने में सफल हुआ है कि मानव अपनी संवेदना को खोता जा रहा है वहीं संवेदनहीन समझे जाने वाले जानवरों के बीच संवेदनशीलता बची हुई है। कहानी में उच्च और मध्यवर्गीय जीवन-पद्धति पर भी प्रतीकात्मक ढंग से कटाक्ष किया गया है।
    ‘ग्यारस’ कहानी धर्म के खोखलेपन को प्रस्तुत करती है। दिखावा परस्त व्यक्ति पर किस कदर हावी हो जाता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण कहानी में पुजारी परिवार स्वयं है। यहां धर्म की अंधता व्यक्ति के व्यक्ति होने के आभास को लीलती प्रतीत होती है। वहीं कहानी ‘पारायण’ में रिश्तों की बखिया उधड़ती नजर आती है। तो ‘गत’ की हंजा बुआ इसी धर्म और संस्कारों की वजह से किशोरावस्था में वैधव्य की त्रासदी से गुजरती हुई, घरों में काम करके गुजर-बसर करती है। मा की मृत्यु के बाद पिता का गम उसे सालता है। वैशाख महीने में पिता के नहीं रहने के बाद उसका दो सौ रुपये देना समाज के पाखंड और थोथे रीति-रिवाजों की पोल खोलते हैं।
    ‘बाथरूम-स्लिपर्स’ आधुनिकता की चकाचौंध और उच्च मध्यम वर्गीय महिलाओं की स्थिति बयां करती है तो ‘न्यारा न्यारा आबा’ अहं की टकराहट से टूटते रिश्तों और अकेलेपन से जूझते जीवन का आइना है। वर्तमान दौर में मन की कोमलता, संवेदनाएं तिरोहित होते जाने की इन कहानियों में शिल्पगत वैशिष्ट्य देखते ही बनता है।
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आधुनिकतम भावभूमि की कहानियां
० डॉ सतपाल खाती, परलीका (नोहर)  

    आधुनिक कहानीकारों में अरविन्द सिंह आशिया ने अपनी कहानियों का एजेण्डा और फण्डा स्वमेव तय कर कहानी को अत्याधुनिक शक्ल प्रदान की है। उन जैसे कहानीकारों द्वारा राजस्थानी कहानी अपने बने-बनाए और बंधे-बंधाए खांचे व सांचे से बाहर निकलने में सफल हुई है। कहानियों की विषयवस्तु के नए क्षेत्रों का सूत्रपात करने वालों में एक भरोसेमंद नाम अरविंद सिंह आशिया का है।     पुरानी वस्तुओं को कबाड़ कहकर खरीदने वाले और उन्हें ’एंटीक पीस’ बताकर बेचने वाले पात्र मोवनियां पर संग्रह की पहली कहानी ’सवासेर’ आधारित है। यह कहानी पूंजीवादी मनोवृति के कुटिल दिमाग और आम सरलमना लोगों की सोच के मध्य का अंतर स्पष्ट करती है। भाषाशैली की दृष्टि से यह कहानी बेहद प्रभावी है और व्यंग्य भरे संवाद पाठक को बांधे रखते हैं। ’अेक हाकम री मिरतु’ कहानी का कथानक नवीन तो नहीं कहा जा सकता क्योंकि ईमानदार अधिकारियों की स्थिति और भ्रष्ट राजनीति पर अनेकों कहानियां लिखी जा चुकी है। भाषा-शैली की दृष्टि से कहानी ठीक प्रतीत होती है।
    दमित नारी की व्यथा-कथा की ’बांझ’ कहानी है, जिसमें संतान नहीं होने के कारण कथा नायिका प्रताड़ना झेलती है। तंग आकर वह अपने पति को मार देती है। पुलिस हिरासत में उसके साथ बलात्कार होता है और वह गर्भवती भी हो जाती है। गर्भवती होने को वह अपनी विजय मानती है और यहीं कहानी समाप्त हो जाती है। हालांकि यह कहानी बेहद साधारण कथानक और दोहराव भरे कथ्य का ही रूप कहा जा सकती है क्योंकि हिरासत में बलात्कार जैसी घटनाएं आजकल संभव नहीं हैं। इसी प्रकार ’1947’ कहानी भारत-पाक विभाजन के समय के कथानक पर आधारित लम्बी कहानी है। इस कहानी में विभाजन की त्रासदी और तत्युगीन वातावरण चित्रित है। यह भी एक साधारण कहानी बनकर रह जाती है।
    संग्रह की प्रभावी कहानी में ’कुत्तौ’ उभरकर सामने आती है। इसमें आम आदमी का व्यवस्था के विरूद्ध अंतहीन संघर्ष को प्रकट किया गया है। भाषा-शिल्प की दृष्टि से यह कहानी अनुपम है और प्रतीक पात्र कहानी को बेहद पठनीय बना देते हैं। ’इग्यारस’ कहानी गांव के छोटे से मंदिर के पुजारी मोवनदास की व्यथा-कथा है। ’पारायण’ कहानी भी साधारण कथानक पर आधारित है जिसमें परिवार के वृद्धतम मुखिया को जबरन ’रामायण’ का पाठ सुनाकर निराहार रखते हुए मार दिया जाता है। ’हंजा भुआ’ कहानी वैधव्य के बाद मजदूरी करते हुए अपना पेट पालती अनवरत संघर्ष करने वाली स्त्री की व्यथा-कथा है। ’बाथरूम स्लिपर्स’ और ’न्यारा-न्यारा आबा’ कहानियों के माध्यम से अरविंद राजस्थानी पाठकों को महानगरीय जीवनशैली के दृश्य बारीकी से दिखाने का यत्न करते हैं। मिसेज मेहरा अपने ससुर के प्रति नफरत मानों उलीच सी देती हैं और उन्हें ’बाथरूम स्लिपर्स’ की उपमा देती हैं। कहानी बेजोड़ है और एक अपरिचित से कथानक को पाठकों तक पहुंचाने में सफलता हासिल की है।
    राजस्थानी में महानगरीय जीवन के दृश्य उपस्थित करने वाले अरविंद पहले कहानीकार हैं। आम जीवन में बदलती हुई भाषा को कहानियों में बेहिचक बरतना अरविंद को दूसरे रचनाकारों से अलग मुकाम दिलाता है। अंग्रेजी की शब्दावली सामान्य युवा वर्ग और शहरी-कस्बाई संस्कृति में रच-बस गई है और इसे स्वीकारना भी होगा।
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कथ्य और शिल्प पर खरी कहानियां
० मधु आचार्य ‘आशावादी’, बीकानेर

      राजस्थानी कहानी की खासियत उसका कथ्य और सरल भाषा शैली है। बात साहित्य के रूप में राजस्थान की साख को आधुनिक रचनाकारों ने भी जीवित रखा है। राजस्थानी कहानी ने समय के साथ अपने को भी बदला है और परिमार्जित किया है। आधुनिक राजस्थानी कथा साहित्य में अरविंद सिंह आशिया का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है। उनका कहनी संग्रह ‘कथा-2’ कथ्य और शिल्प के स्तर पर चर्चित है। 
    संग्रह की 11 कहानियों में जहां विषयगत विविधता है वहीं शिल्प के स्तर पर नवीनता है। कहा जा सकता है कि अच्छी और पठनीय कहानी वह है जो अनावश्यक विस्तार न लिए हो, इस दृष्टि से भी यह कृति सफल है। सफल कहानीकार वह जो कहानी लिखते समय मुख्य रूप से यह ध्यान रखे कि उसे क्या नहीं लिखना है, इस पैमाने पर भी अरविंद जी खरे उतरते हैं।
    संग्रह की पहली कहानी ‘सवासेर’ ग्रामीण परिवेश में रची-बसी कहानी है। मानवीय व्यवहार का दार्शनिक विश्लेषण इस कहानी की खासियत है जो ग्रामीण की जरूरत, संघर्ष और मजबूरी पर भी होले से प्रहार कर जाती है। ‘एक हाकम री मिरतु’ कहानी वर्तमान लालफीताशाही और उससे त्रासद आम आदमी की व्यथा है। ‘बांझ’ कहानी “पेमा’ के जरिए सामाजिक व्यवस्था पर करारी चोट करती है। इस कहानी में प्रचलित मुहावरों का सुंदर उपयोग हुआ है जो पाठ की रोचकता बनाए रखता है।
    आजादी के संघर्ष और समाजों के मध्य उस समय पनपे विद्वैष का जीवंत दस्तावेज है कहानी ‘1947'। इस लंबी कहानी में तत्कालीन समाज की विद्रूपता को जहां एक तरफ स्वर दिया गया है वहीं जातियों के संघर्ष का प्रामाणिक इतिहास भी उकेरा गया है। कहानी उत्सुकता का भाव पाठक में जगाती है इसलिए अंत तक एक सांस में पढ़ने को विवश करती है। कहानी ‘कुत्तौ’ में जानवरी के जरिए मानवीय स्वभाव की पड़ताल है। लेखकीय दर्शन इस कहानी की खासियत है। हिकारात, गाली जैसे शब्दों के माध्यम से लोकतंत्र के मानक बताने का कठिन काम अरविंद जी ने किया है। ‘इग्यारस’ संस्कारों की जड़ता पर जहां कठोर प्रहार करती है, वहीं जीवन मूल्यों के प्रति आदर भाव जगाती है। इस छोटी कहानी में बड़ी बात कही गई है। ‘पारायण’ और ‘गत’ कहानिया समसामयिक धरातल पर रची गई है और मानव के कटु यथार्थ को सश्क्त रूप में अभिव्यक्त करती है।
    संग्रह की अंतिम तीन कहानियां ‘बाथरूम स्लिपर्स’, ‘न्यारा-न्यारा आबा’ और ‘बुझागड़ काको’ अपने कथानक के कारण बहुत प्रभावी है। प्रतिरोध और विद्रोह के स्वर इन कहानियों को महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। इस नजरिये से देखा जाए तो कहानीकार इस संग्रह में प्रतिरोध के स्वर मुखरित करने में सफल हुआ है। राजस्थानी कहानियों का यह एक सुंदर गुलदस्ता है जो राजस्थानी साहित्य को दूसरी भाषाओं के समकक्ष खड़ा करता है। यह संग्रह इस बात का प्रमाण है कि राजस्थानी कहानी ने भी अपने को समय के साथ बदला है। यहा प्रयोग से परहेज नहीं वरन प्रयोग को आधार के रूप में प्रयुक्त देखा जा सकता है। किसी भी कथा-कृति को परखने के दो बड़े आधार- कथ्य और शिल्प को माना गया है, इन दोनों आधारों पर अरविंद सिंह आशिया के इस संग्रह की कहानियां पूरी खरी उतरती है।
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विशिष्ट शैली, शिल्प और नवीन कथ्य की कहानियां 
० राजूराम बिजारणियां, लूनकरनसर (बीकानेर)
    वक्त की आहट को ठीक से पहचान कर आस-पास की विडरूपताओं, चिंताओं, पीड़ाओं एवं जीवन के खुरदरे-चिकने दिनों से झांकते सुख-दुख को धीरज-सावचेती के साथ किसी साधक की भांति साधने का भागीरथी प्रयास रचनाधर्मी बखूबी करते हैं।
    राजस्थानी कहानी विकास-यात्रा में अरविन्द सिंह आशिया अपनी विशिष्ट शैली, शिल्प और नवीन कथ्य के दम पर अलग पहचान बनाने में सफल हुए हैं। 'कथा-2' में भाषा, शिल्प और भावों के मार्फत स्त्री-विमर्श के स्वर, संकीर्णता की पराकाष्ठा, गुणोपेक्षा, निजी स्वार्थों में उछाल, मानवीय मूल्यों का ह्रास, दरकते रिस्तों की आहट, दम घुटती संवेदनाएं शब्द दर शब्द प्याज की परतों की भांति खुलती जाती है। हमें अपने आस-पास तेजी से बदलता परिदृश्य दर्पण की तरह साफ-साफ दिखाई देता है। प्रभावशाली भाषा में मुहावरों और लोकोक्तियों का सटीक प्रयोग रेखांकित किए जाने योग्य है। बानगी स्वरूप देखें तो- एमदियै री टोपी मैमदियै माथै, एक सरपनाथ एक नागनाथ, खब्ती बस मांय सूं थोड़ै ई उतरे, ठीकरी सूं घड़ो फोड़णो, तेल देखो तेल की धार देखो, एक ई थाळी रा चट्टा-बट्टा, थूक बिलोवणो आदि। वहीं संग्रह में ऑक्सन, डिमांड लिस्ट, बेक मिरर, फीड बैक, गैलेरी, टिपिकल, सरनेम जैसे कितने ही अंग्रेजी शब्दों का खुल कर प्रयोग किया गया है किंतु ये कहीं अखरते नहीं, बल्कि भाषा में घुलमिल उसके अंग बन जाते हैं।
    'एक हाकम री मिरतु' कहानी में पात्र एक्स, वाई, जेड को केंद्र में रखकर समाज की मनोवृत्ति का खुलासा करते हुए 'नाम के भीतर नाम' और 'चेहरे के पीछे चेहरे' की खामियां उजागर करते-करते राजनैतिक स्वार्थों को भी बेपर्दा करने का साहस कहानीकार दिखाता है। बंटवारा हर हाल में दुखद होता है, चाहे किसी भी प्रकार का हो.! रिस्ते-नाते,  सीर-संस्कार, घर-परिवार, संवेदना-सरोकार इत्यादि सब कुछ मुठ्ठी से रेत की तरहा फिसलते जाते हैं। कहानी '1947' में भारत-पाकिस्तान के विभाजन की कुछ ऐसी ही त्रासदी बयां हुई है।
    'बांझ' कहानी में  दंभ भरती पुरुष-मानसिकता स्त्री को महज उपभोग की वस्तु मानना व्यापकता से चित्रित हुई है। ‘पण तो ई मरद मरद बाजै। चूंतरा माथै पङ्या पांगरै, जलम्या जद सूं मर् या तद तांई मरद। अर थूं....कदेई लुगाई, कदेई रांड, कदेई चुड़वैलण, कदेई सिकोतरी, कदेई डाकण, कदेई वायरै में आयोड़ी। थारी मरजी कुण पूछै?’ यहां कहानीकार नारी सशक्तिकरण के अनेक प्रश्न प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष खड़े कर झकझोरता है। वहीं लाइफ स्टाइल में आधुनिक रंग भरने को तत्पर उच्च मध्यम वर्ग की नारी मानसिकता का मनोविश्लेषण कहानी ‘बाथरूम-स्लिपर्स’ में देखा जा सकता है। यह कहानी हमें सोचने पर विवश करती है।
कहानी ‘गत’ नायिका हंजा भुआ के इर्द-गिर्द घूमती एक बाप की पीड़ा को खुद के भीतर समेटे है जो बेटी के जरिए बड़ी मार्मिक बन पड़ी है। कहानी ‘सवासेर’ में शेर पर सवाशेर से हम रू-ब-रू होते हैं, तो आम आदमी की बेबसी का पोस्टमार्टम करती 'कुत्तौ' कहानी में विवशता को छुपाने एवं गरीबी को ढांकने में तुलसी-पत्र का सहारा कहानी 'इग्यारस' में देखा जा सकता है। 'न्यारा-न्यारा आबा' रिश्तों की टूटन और एकाकीपन की सशक्त कहानी है।
    अरविंद सिंह आशिया की कहानियों के पात्र जीवन से कदमताल मिलाते, आधुनिक कहे जाने वाले समाज की अनेक त्रासदियों को जीवंत रूप में वर्णित करते हैं। ये कहानियां शिल्प और भाषा से पहचान बनाने में सक्षम है।
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लोक रंगों और घनीभूत भावनाओं की कहानियां
० डॉ. जयदेव पानेरी, उदयपुर

    जैसे ही कथा-2 संग्रह के बारे में लेखन का विचार किया वैसे ही बरसों पहले पढ़े प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नगेंद्र के एक निबंध ‘साहित्य में आत्माभिव्यक्ति’ का मूल प्रश्न ‘मैं क्यों लिखता हूं...’ मस्तिष्क की जाने कौनसी खोह से निकलकर मानस पटल पर लहराने लगा, किंतु अपने मूल स्वरूप में नहीं, बल्कि मेरी इस मौलिक ध्वनि के साथ कि आज की नयी पीढी को जब किताबों से ‘कै’ आती है तो ‘मैं क्यों पढ़ता हूं...’। नगेंद्र जी ने तो बेहद खूबसूरत और विस्तृत शब्द-वितान के साथ अपने प्रश्न को विश्लेषित किया है लेकिन मेरी सामर्थ्य पांडित्य की नहीं महज शब्द-यात्री की है, इसीलिए अपने मानस में उठे इस प्रश्न को कि ‘मैं क्यों पढ़ता हूं’ का बेहद सरल सा जवाब ही पाता हूं और वो ये है कि ‘अरविंद जी जैसे लेखक आज साहित्य की पतवार थामें हैं शायद इसलिए...’।
मैं ये नहीं कहता कि मैनें हिंदी के पुराने रचनाकारों की भांति नये लेखकों बहुत को पढ़ा है लेकिन ये कह सकता हूं कि जितने लेखक पढ़ें हैं उनमें अरविंद जी का मिजाज कुछ हटकर है और शायद ‘हटकर होना’ ही ‘अपने होने को’ आज के समय मे साबित करने का एक मुख्तसर-सा अंदाज है। कथा-2 इसका उदाहरण है। वैसे इसे योग ही कहूंगा कि अरविंद जी से मेरा व्यक्तिशः संपर्क भी रहा और मैनें पाया जैसे वे हैं, वैसे वे नहीं हैं। फर्राटे से अंग्रेजी बोलते हुए अचानक हिंग्लिश में चुटकियां लेने लगते हैं और बीच-बीच में उर्दू के लफ्जों को यूं बेसाख्ता बुरका देते हैं, लगता है भाषा की पाकशाला में ऐसा अनुपम पकवान तैयार हो रहा है जिसका नामकरण अभी शेष है। लेकिन इस अंग्रेजी पसंद शख्सियत में इतना संवेदनशील देसीपन होगा यह यह अंदाजा लगाना बिना इनकी कलम का कमाल देखे संभव ही नहीं है। इन्हें मारवाड़ से बाहर आकर मेवाड़ में बसे एक अर्सा हो गया लेकिन फिर भी मारवाड़ इनमें बना रहा, अर्जन भले ही हिंदी में किया लेकिन सर्जन का सेतु राजस्थानी ही बनी। कथा-2 संग्रह इसका प्रमाण है। कहानियों में बिखरे धोरों की धरती के लोकरंग जहां इन्हें मायड़ संस्कारों से जोड़ते हैं तो वहीं इनकी कहानियों की गहरी और घनीभूत संवेदनाएं पाठक के लिए मानस मंथन का कारण बन जाती है।
कथा-2 की कहानियॉं साहित्य के सामाजिक सरोकारों को ईमानदारी से निभाती है। ‘एक हाकिम री मिरतु’ में जिस राजनैतिक स्याह पाताल गंगा के दर्शन होते हैं वह पाठकों की वास्तविक दुनियां से परे नहीं है। इस कहानी में आम आदमी की त्रासद दशा के चित्र पाठक को बैचेन करते हैं। कहानी ‘सवासेर’ ऊपरी तौर पर भले ही हास्य कथा लगे लेकिन अंतर्दृष्टि युक्त पाठक पाता है कि हमारे यहां एक ही समाज के दो छोर हैं एक छोर पर दूसरों को बेवकूफ बनाकर जीवन करने यापन की विवशता हैं तो दूसरे छोर के लोगों के लिए बेवकूफ बनकर भी जी जाने की मजबूरी है। कथांत में एंटिक बक्से का टूटकर्र इंधन में बदल जाना इंगित कर जाता है कि जीवन तो हल्का फुल्का ही है ख्वाहिशों का बोझ ढोते-ढोते हम कब दो पाये से चौपाये बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता।
इसी संग्रह की कहानी ‘1947’ अपने विस्तार के साथ ही पाठक की संवेदनाओं को टटोलती चलती है तथा अपने अंत के साथ ही यह प्रमाणित करने में सफल होती है कि ‘इंसान को ईश्वर ने बनाया है और सरहदों को इंसान ने इसीलिए इंसान आज भी सच्चा है और सरहदें बेईमान’।
महादेवी ने ‘नीरभरी दुःख की बदली’ लिखकर जिस पुरूष प्रधान समाज में स्त्री पीड़ा को स्वर दिया उसी पुरूष प्रधान समाज को लानत के कठघरे में घेरकर अट्टाहास करती ‘बांझ’ कहानी की ‘पेमा’ भीतर तक झकझोर जाती है। पेमा के अट्टाहास के साथ कहानी भले ही समाप्त हो जाती है लेकिन एक चिंतन आरंभ होता जो स्त्री की दारूण स्थिति पर सभ्य समाज को विचलित करता है।
‘कुत विधि रची नारि जग माही, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ लिखकर बरसों पहले तुलसी जिस सवाल को छोड़ गये वह आज भी अनुत्तरित ही है। अरविंद जी की कहानी ‘गत’ उसी सजल श्रद्धा स्वरूपा स्त्री की भावनाओं को स्वर देती है। हंजा गरीब है, विषम परिस्थिति में है लेकिन पिता से मिलना उसके लिए एक साध है। पिता के नहीं रहने पर गरीब होते हुए भी महज इस विश्वास पर एकत्र धनराशि से प्याऊ लगवा देना कि शायद पिता को इससे मोक्ष मिल जाए, भीतर तक पाठक को भिगो जाती है।
‘ग्यारस’ कहानी में समर्पण की पराकाष्ठा दिखाई देती है प्रसाद की आकांक्षा में भूखा रहा परिवार का मुख्य पात्र तुलसी दल से व्रत खोल ग्यारस का पुण्य प्राप्त करने का बहाना बनाकर अपना दर्द छिपा ले जाता है। लेकिन पाठक उसके दर्द की नमी को बेहद करीब से महसूस करता है। इसी संग्रह की कहानियां पारायण, बुझागड़ काका और बाथरूम स्लीपर भी अपने आप में विविध रंगों को समेटे हुए है तथा पाठक को बांधने में सफल रही है।
साहित्य में कठिन लिखना सरल है लेकिन सरल लिखना बहुत कठिन है,  यह कठिन कार्य अरविंद जी ने मायड़ भाषा के लिए किया है। और तब जब राजस्थानी अपनी मान्यता के लिए संघर्ष कर रही है  ऐसे में अरविंद जी जैसे लेखक जिस दक्षता से इस मायड़ भाषा में अपने हृदय को ढाल रहे हैं तो लगता है कि सरकारी प्रमाणपत्रों से इतर यह भाषा स्वयंमेव अपने हस्ताक्षर है। लोक रंगों और घनीभूत भावनाओं में सीझती-भीगती ये राजस्थानी कहानियां आंगन से उठी वह सौंधी महक है जो इत्रों से भरे बाज़ार में अपनी मौलिकता से पहचानी जाएगी। मायड़ भाषा के मानस पुत्र को पाठकों की कोटिशः शुभकामनाएं।
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राजस्थानी कहानी का वर्तमान ० डॉ. नीरज दइया

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